स्कंद पुराण: महापुराणों में सर्वाधिक व्यापक और आध्यात्मिक महत्व
स्थान: वाराणसी – (रिपोर्टर)
खबर का सार
स्कंद पुराण को अठारह महापुराणों में सबसे बड़ा और व्यापक माना जाता है। यह पुराण भगवान शिव और पार्वती के पुत्र स्कंद अर्थात कार्तिकेय के जन्म, उनके जीवन और उनकी महत्ता का विस्तारपूर्वक वर्णन करता है। यह धर्मग्रंथ न केवल देवी-देवताओं की कथाओं को प्रस्तुत करता है, बल्कि हिन्दू धर्म के विविध रीति-रिवाजों, तीर्थ स्थानों तथा आध्यात्मिक उपदेशों को भी समाहित करता है। इस पुराण की व्यापकता और गहराई इसे धार्मिक अध्ययन और साधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है।
घटना का विस्तार
स्कंद पुराण में भगवान कार्तिकेय के जन्म एवं उनके बाल्यकाल के अद्भुत प्रसंगों को विस्तार से बताया गया है। उनके बचपन में ही वे दिव्य शक्ति के प्रतीक के रूप में उभरते हैं और अपने कर्तव्यों का निर्वाह बड़ी ऊर्जा व बुद्धिमत्ता से करते हैं। इस पुराण में उनके अनेक अवतारों, युद्धों तथा भक्तों के प्रति उनकी मातृभक्ति का चित्रण मिलता है। इसके साथ ही पुराण में कई तीर्थस्थलों का वर्णन है जहाँ श्रद्धालु अधिष्ठान कर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। पुराण के विभिन्न खंडों में विभिन्न धार्मिक तथा आध्यात्मिक विषयों का वर्णन है, जो इसे सम्पूर्ण धार्मिक ग्रंथ का रूप देते हैं।
संबंधित बयान/प्रतिक्रिया
धार्मिक विद्वान और पुराण विशेषज्ञ डॉ. राजीव शर्मा ने बताया, “स्कंद पुराण केवल एक ग्रंथ नहीं बल्कि समृद्ध भारतीय संस्कृति और धर्म का साक्ष्य है। यह पुराण हमें हमारे धार्मिक मूल्यों, सामाजिक कर्तव्यों और आध्यात्मिक उन्नति की सही दिशा दिखाता है। इसे पढ़ना और समझना सभी के लिए लाभदायक है।” वहीं, स्थानीय संत श्री नारायण दास का कहना है कि “कार्तिकेय की कथा न केवल वीरता बल्कि आत्मा की शांति और भक्ति का संदेश देती है, जो आज के बदलाव के दौर में विशेष रूप से आवश्यक है।”
अतिरिक्त जानकारी और प्रभाव
स्कंद पुराण का धार्मिक महत्व उसके आध्यात्मिक संदेशों में निहित है, जो जीवन के विविध पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। यह पुराण भारत के अनेक तीर्थस्थलों की महिमा भी बताता है, जिससे धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। इसके अध्ययन से न केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक समरसता की भी समझ विकसित होती है। वर्तमान समय में कई मंदिरों और धार्मिक संस्थानों में स्कंद पुराण के पुनर्पाठ और व्याख्यान आयोजित किए जाते हैं, जो जनता में धार्मिक जागरूकता बढ़ाने का कार्य करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह पुराण आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन काल में था।
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