जस्टिस बीवी नागरत्ना ने महिलाओं को तत्काल कानूनी सहायता देने पर दिया जोर, पुलिस स्टेशन और अस्पतालों में व्यवस्था की वकालत

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

नई दिल्ली, दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस बीवी नागरत्ना ने महिलाओं को किसी घटना के तुरंत बाद कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए कानूनी सहायता की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे जरूरत पड़ने पर उन्हें शुरुआती स्तर पर ही उचित कानूनी मार्गदर्शन मिल सके। उन्होंने पुलिस स्टेशनों और अस्पतालों में तत्काल कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया।

जस्टिस नागरत्ना शनिवार को राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा कर्नाटक हाई कोर्ट और कर्नाटक न्यायिक अकादमी के सहयोग से आयोजित दक्षिण क्षेत्रीय सम्मेलन में बोल रही थीं। सम्मेलन का विषय “महिलाओं के लिए न्याय” था। उन्होंने कार्यक्रम का उद्घाटन किया और महिलाओं तक न्याय की पहुंच को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

उन्होंने कहा कि किसी घटना के बाद कानूनी प्रक्रिया शुरू करने के लिए महिला को इधर-उधर भटकना नहीं पड़ना चाहिए। शुरुआती समय में कानूनी सलाह मिलने से महिला अपने अधिकारों और उपलब्ध विकल्पों को बेहतर तरीके से समझ सकती है। इसके लिए राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों और पुलिस तथा स्वास्थ्य सेवाओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने की आवश्यकता है।

तालुका स्तर तक हो मजबूत समन्वय

जस्टिस नागरत्ना ने सुझाव दिया कि राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों की व्यवस्था को तालुका स्तर तक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, गांवों के सरकारी अस्पतालों और पुलिस स्टेशनों से बेहतर तरीके से जोड़ा जाए। इससे उन महिलाओं तक भी कानूनी सहायता पहुंचाई जा सकेगी, जो बड़े शहरों या जिला मुख्यालयों से दूर रहती हैं।

उन्होंने पैरालीगल वालंटियर की उपलब्धता को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार पैरालीगल वालंटियर को कम समय की सूचना पर उपलब्ध रहने में सक्षम होना चाहिए, ताकि घटना के बाद महिला को तत्काल सहायता मिल सके। स्थानीय स्तर पर कानूनी सहायता की यह व्यवस्था महिलाओं के लिए न्याय तक पहुंच आसान बनाने में मदद कर सकती है।

कानूनी सहायता का परिणाम भी मापा जाए

सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश ने कानूनी सहायता योजनाओं के मूल्यांकन के तरीके पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि केवल यह आंकड़ा देखना पर्याप्त नहीं है कि कितने लाभार्थियों ने कानूनी सहायता प्राप्त की। इसके बजाय अध्ययन इस बात पर केंद्रित होना चाहिए कि कानूनी मदद से महिलाओं को वास्तविक रूप से क्या परिणाम मिला और न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया में इसका कितना प्रभाव पड़ा।

उन्होंने कर्नाटक में हाल में हुए उन बदलावों का भी उल्लेख किया, जिनसे पहली नियमित अपील पर हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में कमी आई है।

4,14,795 महिलाओं ने ली कानूनी सहायता

राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण के आंकड़ों का हवाला देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने बताया कि अप्रैल 2025 और मार्च 2026 के बीच 4,14,795 महिलाओं ने कानूनी सहायता प्राप्त की। उन्होंने इस आंकड़े को सराहनीय बताया।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कानूनी सहायता की पहुंच को केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि व्यवस्था की गुणवत्ता और उसके वास्तविक परिणामों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। महिलाओं को घटना के तुरंत बाद सहायता उपलब्ध कराने के लिए पुलिस, अस्पताल, कानूनी सेवा संस्थाओं और पैरालीगल वालंटियर के बीच बेहतर समन्वय इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

KPN News
Author: KPN News

Leave a Comment

और पढ़ें