खबर पर नजर: विशेष रिपोर्ट
क्या सिर्फ ‘महंगी’ दवा ही जान बचाती है? जानिए जेनेरिक दवाओं का सच
लेखक: खबर पर नजर डेस्क
दिनांक: 28 नवंबर 2025
विषय: स्वास्थ्य और जेनेरिक दवाएं (Generic Medicine)
परिचय: एक आम आदमी की उलझन
शहर के एक व्यस्त मेडिकल स्टोर पर 65 वर्षीय रमेश बाबू अपने कांपते हाथों से पर्चा थामे खड़े थे। महीने भर की डायबिटीज और ब्लड प्रेशर की दवाओं का बिल बना था—3,500 रुपये। उनकी पेंशन का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ इन गोलियों में जाने वाला था। रमेश बाबू ने दुकानदार से दबी जुबान में पूछा, “भैया, कुछ डिस्काउंट नहीं मिलेगा क्या?” दुकानदार ने सपाट चेहरे से मना कर दिया।
यह कहानी सिर्फ रमेश बाबू की नहीं है, बल्कि भारत के हर उस मध्यमवर्गीय परिवार की है जो बीमारी से ज्यादा ‘इलाज के खर्च’ से डरता है। लेकिन क्या हो अगर हम आपसे कहें कि यही 3,500 रुपये की दवा आपको मात्र 700 से 800 रुपये में मिल सकती थी?
जी हाँ, ‘खबर पर नजर’ की आज की इस खास रिपोर्ट में हम बात करेंगे उस संजीवनी की जिसे दुनिया ‘जेनेरिक दवा’ (Generic Medicine) के नाम से जानती है।
आखिर क्या है यह ‘जेनेरिक’ का गणित?
आम जनता के मन में एक बड़ा सवाल होता है—”अगर दवा इतनी सस्ती है, तो क्या वो असर करेगी?” इस भ्रम को तोड़ने के लिए हमें दवा के विज्ञान को समझना होगा। हर दवा का एक मुख्य रसायन होता है, जिसे ‘साल्ट’ (Salt) कहते हैं। उदाहरण के लिए, बुखार की मशहूर दवा का साल्ट ‘पैरासिटामोल’ है।
ब्रांडेड दवा: जब कोई बड़ी कंपनी उस साल्ट को अपने नाम (जैसे क्रोसिन या डोलो) से बेचती है, तो वह ‘ब्रांडेड’ कहलाती है।
जेनेरिक दवा: जब वही साल्ट अपने असली रासायनिक नाम (पैरासिटामोल) से बेचा जाता है, तो उसे ‘जेनेरिक’ कहते हैं।
खबर पर नजर की पड़ताल: लैब में जाँचने पर पता चलता है कि ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता, असर (Efficacy), और सुरक्षा (Safety) में 0% का अंतर होता है। अंतर सिर्फ नाम और दाम का है।
सस्ती क्यों होती हैं जेनेरिक दवाएं?
यह सवाल वाजिब है। अगर चीज वही है, तो दाम में इतना जमीन-आसमान का फर्क क्यों?
हमने दवा विशेषज्ञों से बात की और पाया:
कोई रिसर्च खर्च नहीं: ब्रांडेड कंपनियों को नई दवा खोजने में अरबों खर्च करने पड़ते हैं, इसलिए वे पेटेंट के दौरान दवा महंगी बेचती हैं। जब पेटेंट खत्म होता है, तो जेनेरिक कंपनियां उसी फॉर्मूले का इस्तेमाल करती हैं, जिससे रिसर्च का खर्च बच जाता है।
मार्केटिंग की बचत: जेनेरिक दवाओं के लिए टीवी पर विज्ञापन नहीं दिए जाते, न ही डॉक्टरों को लुभाने के लिए एमआर (MR) भेजे जाते हैं। यह सारी बचत सीधे ग्राहक की जेब तक पहुँचती है।
बदलाव की बयार: जन औषधि केंद्र
भारत सरकार की ‘प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना’ (PMBJP) ने इस दिशा में एक क्रांति ला दी है। आज देश भर में हजारों जन औषधि केंद्र खुले हैं।
वापस चलते हैं रमेश बाबू की कहानी पर। जब रमेश बाबू मायूस होकर दुकान से निकले, तो उनके पड़ोस में रहने वाले एक युवा ने उन्हें पास के ‘जन औषधि केंद्र’ चलने की सलाह दी। रमेश बाबू हिचकिचाए, उन्हें लगा सस्ती दवा ‘नकली’ होगी। लेकिन जब उन्होंने वहां से दवा ली, तो बिल बना मात्र 850 रुपये।
अगले महीने जब वे डॉक्टर के पास गए, तो उनकी शुगर और बीपी दोनों कंट्रोल में थे। रमेश बाबू समझ चुके थे कि इलाज के लिए ‘ब्रांड’ नहीं, ‘साल्ट’ जरूरी है।
‘खबर पर नजर’ की अपील: जागरूक बनें
दवा कंपनियों और महंगे अस्पतालों के गठजोड़ के कारण अक्सर मरीजों को जेनेरिक दवाओं के बारे में बताया ही नहीं जाता। लेकिन एक जागरूक नागरिक के तौर पर आपके पास अधिकार हैं:
डॉक्टर से कहें: डॉक्टर से निवेदन करें कि वे पर्चे पर दवा का जेनेरिक नाम (Salt Name) लिखें।
गूगल करें: अपनी दवा का नाम गूगल पर डालें और उसका जेनेरिक विकल्प (Substitute) देखें।
जन औषधि ऐप: अपने फोन में ‘जन औषधि सुगम’ ऐप डाउनलोड करें और पास के केंद्र का पता लगाएं।
निष्कर्ष
बीमारी अमीर-गरीब देखकर नहीं आती, लेकिन इलाज का खर्च गरीब को और गरीब बना देता है। जेनेरिक दवाएं उस खाई को भरने का काम कर रही हैं। यह सिर्फ सस्ती दवा नहीं है, यह हर भारतीय का स्वास्थ्य का अधिकार है।
महंगी दवाओं के भ्रम जाल से निकलिए, और जेनेरिक को अपनाइए।
‘खबर पर नजर’ – सच, जो आपके हित में है।










