गुरुदेव श्री राजेंद्र सूरीश्वरजी म.सा. का व्यक्तित्व – एवरेस्ट से ऊंचा

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*गुरुदेव श्री राजेंद्र सूरीश्वरजी म.सा. का व्यक्तित्व – एवरेस्ट से ऊंचा आकाश से अधिक विशाल एवं सागर से अधिक गहरा था*

 

(संकलन- अशोक श्रीश्रीमाल, इंदौर)

 

 गुरुदेव के जन्म स्वर्गारोहण व जन्म द्विशताब्दी वर्ष के उपलक्ष में *गुमास्ता नगर श्री सीमंधर स्वामी राजेंद्र सूरी गुरु मंदिर में पूज्य साध्वीजी श्री चारित्रकला श्री जी म.सा.* की पावनकारी निश्रा में सप्त दिवसीय कार्यक्रम विभिन्न आयोजन के साथ संपन्न हुए । आज गुरु सप्तमी पर प्रातः गुरुदेव की प्रतिमा तथा फोटो के साथ शोभा यात्रा निकली, इसके पूर्व 24 घंटे के जाप हुए, *संघ की श्राविका, महिला परिषद की श्रीमती अर्चनाजी चत्तर ने एक बैठक पर बिना उठे 24 घंटे का जाप कर इतिहास बनाया, ट्रस्ट द्वारा उनका बहुमान भी किया ।* महिला परिषद ने गुरुगुण इक्कीसा पर सुंदर चित्रावली बनाई, आज अभिधान श्री राजेंद्र कोष जिस पर की वर्ष भर वासक्षेप पूजा होगी, की स्थापना भी की गई। साथ ही वर्ष भर के गुरु भक्ति के कार्यक्रम की बुक दी, श्रीमती सुधर्मा जी ने भी विचार रखे ।

*पूज्य चारित्रकला श्री जी म.सा. जी ने गुरु गुणानुवाद की श्रृंखला को बढ़ाते हुए गुरु को शब्दों की पुष्पांजली देते हुए कहां*

पूज्य गुरुदेव के जीवन के व्यक्तित्व का आकलन करना सामान्य मानव की शक्ति व शब्द के परे है। पूज्य गुरुदेव के जीवन का विचार जितना भी किया जाय कम ही है । गुरुदेव अज्ञान के अंधकार को हटाने वाले ज्ञान का प्रकाश देने वाले भविष्य के गर्त में छुपी घटनाओं को बताने वाले ज्ञानी, ध्यानी, लेखक, चिंतक, अनुभवी व सिद्धपुरूष थे, उनका व्यक्तित्व हिमालय से ऊंचा व दृढ़, आकाश से अधिक विशाल और सागर से अधिक गहरा था। उनका जीवन परोपकार से सना था अध्यात्म जगत के वे सूर्य थे। सूर्य को देखकर कमल खिल उठता- चारों और उल्लास उत्साह का संचरण होता है, वेसे ही गुरु के नाम मात्र से हृदय कमल खिल उठती हैं । जन्म से लेकर प्रयाण तक उनके जीवन पर एक एक प्रसंग पर एक एक ग्रंथ लिखे तो भी ग्रंथ कम पड जाय ।

गुरुदेव इतिहासकार, नीतिकार, भाष्यकार, निबंधकार, आशुकवि चिंतक, क्रांति के अग्रदूत, उग्रविहार,, तपस्वी, क्षमाश्रमण, प्रवचनकार, भविष्य वक्ता, निडर थे । विरल विभूति श्री गुरुवर ने छप्पनिया काल की घोषणा एक साल पहले ही कर दी थी । शुरूआत में आप शिवगंज में थे तब आपने ध्यान में श्याम सर्प को विषवमन करते देखा जिससे आपने भविष्यवाणी की कि इस साल भयंकर अकाल होगा जो सत्य साबित हुई।

 

*अंतिम समय का पूर्वाभास -*

अदभुत योगी पूज्य श्री को से अंतिम समय का पूर्वाभास पहले ही हो चुका था । इसके विभिन्न दृष्टांग उल्लेखनीय है 

1. स्वर्गवास के तीन वर्ष पूर्व ही आचार्य श्री को वि. सं. 1960 के शीतकाल में रात्रि में ध्यानावस्था में किसी समय स्वयं की आयु के बारे में भी पता लग गया था। 

2. सूरत चातुर्मास में किसी श्रावक के प्रश्न के प्रत्युत्तर में आपने शिष्यों और श्रावकों के बीच बताया भी था कि “मैं अभी तीन वर्ष और भूमण्डल पर विचरूँगा । 

3. इसी प्रकार मांडवगढ़ का रास्ता छोड़कर राजगढ की ओर जाते समय मार्ग में आचार्यश्री की शारीरिक अस्वस्थता के समय किसी शिष्य ने आपके वस्त्र- पात्रादि उठाने हेतु आपसे याचना की तब भी आपने उसे नहीं देते हुए सारगर्भित शब्दों में कह दिया था कि ‘अब लम्बा विहार कहाँ करना है, राजगढ ही तो पहुंचना है।

4. वि.स. 1963 में जब आप बड़नगर में चातुर्मासार्थ विराजमान थे तब मारवाड राजस्थान से कुछ श्रावक वहाँ की प्रतिष्ठा आपके द्वारा करवाने हेतु प्रतिष्ठा का मुहूर्त लेने आये, तब आपने कह दिया था कि मेरे हाथ से कोई प्रतिष्ठा अब नहीं होना है। महान तन्त्र विद्या भी जानते थे ।

 

अनुभवसिद्ध योगी होने के साथ-साथ आचार्यश्री तन्त्र प्रयोग के भी विशद् विद्वान थे। आपके मुखारविन्द से मांगलिक श्रवण करने मात्र से राजगढ निवासी श्री चुन्नीलालजी खजांची राजगढ़ स्टेट के खजांची बन गये और उन्होंने राजगढ़ में अष्टापदावतार जिनालय बनावाकर आपके हाथों प्रतिष्ठा करवाई। उनके पुत्र धार स्टेट के राय बहादुर बने। दरिद्र स्थिति वाले खाचरोद निवासी चुन्नीलालजी मुणत को आपके आशीर्वाद से मात्र 15 दिनों की अल्पावधि में न्याय नीतिपूर्वक व्यापार में इतना धन प्राप्त हुआ कि इन्होंने बडावदा में श्री चिन्तामणि पार्श्वनाथ जिनालय बनवाया एवं मक्सीजी (म.प्र) तीर्थ का छरी पालक संघ निकाला। आहोर निवासी चमनाजी ने आपके वाशक्षेप एवं मागलिक मात्र से मृत्युशय्या पर से अपने प्राण बचाये और स्वस्थ दीर्घायु प्राप्त की। इसी प्रकार सूरत नगरसेठ पुत्र के प्राण बच गये एवं उसकी नष्ट हुई नेत्र ज्योति पुनः प्राप्त हुई।

 

इस प्रकार योगसिद्ध आचार्यश्री के आशीर्वाद, कृपादृष्टि, वासक्षेप एवं मांगलिक के प्रभाव से कईयों के जीवन का उद्धार हुआ और उन आत्माओं ने आचार्यश्री की प्रेरणा से आत्मकल्याण किया।

 

आचार्य श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी अनेक प्रकार की तात्रिक, मात्रिक एवं अन्य चमत्कारिक विद्याओं के ज्ञाता थे। ये विद्याएँ उन्होंने यति श्री सागरचन्द्रजी से अपने यतिजीवन के अध्ययन काल में सीखी थी एवं पचांगी सहित जैनागमो के अध्ययन की समाप्ति पर श्रीपूज्य देवेन्द्रसूरिजी ने स्वयं के पास स्थित अपने आम्नाय की सिद्ध अलभ्य विद्याएँ आचार्यश्री की योग्यता देखकर गुरुकृपा एवं आशीर्वाद के रूप में प्रदान की थी। प्रसंगवश, मिथ्या अभिमान के खडन या स्व-धर्म प्रभावना अथवा संघरक्षा के प्रसगो से हमें इनकी तनिक झलक मिलती है।

 

वि.स. 1919 में एक बार मुनि रत्नविजयजी आहोर में थे तब किसी इंद्रजालिक ने इंद्रजाल से आम्रवृक्ष प्रगट किया तब लोक प्रशंसा से वह मिथ्या अभिमान करने लगा। तब गुरु आदेश से यत्ति रत्नविजयजी ने (आचार्य श्री के आचार्यत्व के पूर्व का नाम) आकाश में बहुत बड़े शरीरबाला एक पुरूष प्रगट किया जिसके अनेको हाथ थे और प्रत्येक हाथ में विभिन्न शस्त्र थे। इसे देखकर लोग भयभीत होकर भागने लगे तब आपे इसे समेट लिया और अन्य अनेक दृश्य दिखाये।

 

वि.सं. 1933 में जालोर (राज) में यति तखतमल आदि को मंत्र साधना में कुछ गडबड होने पर सर्प ने काटा त्तब मुनि रत्नविजयजी ने उसे स्वस्थ कर दिया था।

 

वि.सं 1933 में जालोर (राज) मे यति तखतमल आदि स्थानकवासियों के अभ्याक्षेप पर आपने खैरादीवास में वासुपूज्यस्वामी भगवान की प्रतिमाजी के मुखारविंद से स्थानकवासियों के प्रश्नों के उत्तर दिलवाये थे। जावरा, खाचरौद, भीनमाल आदि जगह कुछ विद्वेषी यतियों ने

तात्रिक प्रयोग किये आपके प्रभाव से किसी का नुकसान नहीं हुआ, शिवगंज प्रतिष्ठा में जब किसी यति ने आग का तंत्र प्रयोग किया तब गुरुदेव ने नवकार बोलकर उसके प्रभाव को खत्म किया प्रायश्चित्त स्वरूप अट्ठम तप का प्रत्याख्यान किया।

 

वि.स. 1959 में आचार्यश्री अपनी शिष्य मंडली के साथ राणकपुर की नाल (घाटी वाला रास्ता) पर एक नाले के पास वटवृक्ष के नीचे अवस्थान किया और सब से कहा कि कोई भी वटवृक्ष की छाया से बाहर न जाये रात्रि में नाले में शेर पानी पीने आया तब मुनि लक्ष्मीविजयजी ने शेर जैसी आवाज की जिससे छाया से बाहर शेर सामने आकर खडा हो गया, साधु घबराने लगे। तब आचार्यश्री ने त्राटक किया, जिससे शेर कुछ क्षन स्थिर बैठ गया और फिर गर्जना करता हुआ छलाग लगाकर पर्वतों पीछे चला गया।

*बाग (म.प्र.) में 12 जैन परिवार थे परंतु अनेकों प्रयत्न करने पर आर्थिक, धार्मिक या पारिवारिक किसी भी तरह से उनकी उन्नति नहीं रही थी तब वि स 1962 में कुक्षी चातुर्मास हेतु बाग पधारे। आचार्यश्री सन्मुख वहाँ के तत्कालीन निवासियों के द्वारा इसका कारण पूछने आपने बताया कि, बाग के तत्कालीन जिनालय के मूलनायक पार्श्वनाथजी गाँव की राशि के अनुसार संगत नहीं है एवं उनकी व गाँव की ओर नहीं होने से नगर एवं श्रीसंघ की उन्नति नहीं हो रही है। तब रामपुरा आये बाग श्री सघ की भावभरी विनती को स्वीकार आपने प्राचीन जिनबिंब एव जिनालय को उत्थापित कर नये सौध शिखरी जिनालय में नये मूलनायकजी विमलनाथ जीकी अंजनशलाका-प्राणप्रतिष्ठा की स. 1962 मार्गशीर्ष सु 2)। उस महोत्सव में वहाँ बाघनी नदी के श्मसान में जाकर समस्त उपद्रवकारी आसुरी तत्वों को तप-ध्यानयोगबल से अपने वश में करके बाग श्री संघ एवं बाग नगर को समृद्ध कर दिया*। इस प्रकार आचार्यश्री अनेकों तांत्रिक मांत्रिक कि के ज्ञाता होने के बावजूद इन्होंने कभी भी अपनी विद्याशकि दुरुपयोग नहीं किया।

गुरुदेव के अधिकांश विचरण, मारवाड़, मालवा, गुजरात में थराद, अहमदाबाद, व सूरत रहा।

मालवा में विशेषकर रतलाम, जावरा, खाचरोद, कुक्षी वी राजगढ़ में अनेक चातुर्मास कर धर्म की खूब प्रभावना की।

 

श्री राजेंद्र सूरी जी की बढ़ती ख्याति से अन्य समुदाय वर्ती साधु पचा नहीं पाते, एसे अनेक अवसर आयोजन गुरुदेव को ठहरने, चौमासे करने,अथवा व्याख्यान आदि में बाधा डालते थे, गुरुदेव तो शांत रहते पर उनके मालवा वासी भक्त डटकर मुकाबला करते थे

 पालीताणा में उन्हें ठहरने के लिए जगह, या धर्मशाला, उपाश्रय नहीं दिए, तब कुक्षी के पोरवाल परिवार ने पालीताणा जाकर हाथों हाथ

 चम्पा निवास धर्म शाला बनाई वो गुरुदेव को वसती प्रदान की

 

 सूरत चातुर्मास में इनके व्याख्यान में श्रावकों की अन्य समुदायवर्ती साधु जाने से रोकते थे तब मालवा के काफी श्रावक वहां पहुंचे तथा व्याख्यान के पहिले दिन प्रभावना में सोने की गिन्नी दी, लोगो में चर्चा फैल गई, दूसरे दिन चांदी के सिक्के बांटे ,श्रावक का हुजूम का हुजूम आपके व्याख्यान में आने लगा

 गुरुदेव के व्याख्यान भी प्रभावशाली, व आत्मा उद्धारक रहते, जिससे लोग खूब प्रभावित होते, ।करतूत करने वाले साधु खाली पांडाल की शोभा बने।

इस प्रकार अनेक ऐसे अवसर आए जब मालवा के गुरु भक्तों ने अपनी गुरुभक्ति का परिचय दिया। गुरुदेव ने भी मालवा वासी को खूब अंतर से आशीर्वाद दिए।

 

कार्यक्रम के अंत में पूज्य साध्वी जी परिवार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए क्षमा याचना भी परस्पर की।

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Author: KPN News

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