गुवाहाटी, असम | 27 अप्रैल 2024
असम में भाजपा की जूनियर सहयोगी पार्टी, असम जन परिषद (एजीपी), आगामी विधानसभा चुनाव में पिछली बार जितनी सीटों पर चुनाव लड़ने का अवसर पा रही है, लेकिन गहराई से विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि पार्टी की जमीन धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। पिछले चुनाव में पार्टी ने जहां कुल 14 सीटों पर अपनी दावेदारी जताई थी, वहीं इस बार भी उन्हें उतनी ही सीटें मिली हैं। फिर भी, चुनावी रुझानों और मतदाता व्यवहार पर नजर डाले तो कई संकेत मिलते हैं जो पार्टी के लिए चिंता का सबब बन सकते हैं।
पिछले दस वर्षों से असम में सत्ता में शामिल होने के बाद भी एजीपी अपनी मजबूत स्थिति बनाये रखने में सफल नहीं हो पाई है। हाल के सर्वे और क्षेत्रीय विश्लेषण बताते हैं कि पार्टी को मुख्यधारा की राजनीति में लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। खासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में पार्टी की लोकप्रियता में गिरावट देखने को मिली है, जबकि नए दर्जे की राजनीतिक पार्टियों ने वहाँ अपनी पकड़ मजबूत की है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के साथ गठबंधन के चलते एजीपी ने अपनी पहचान को एक सीमा तक कायम रखा है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनकी अपील में कमी आई है। मतदाता अब ज्यादा विकल्पों की तलाश में हैं और पारंपरिक गठबंधनों के प्रति उनकी निष्ठा कमजोर पड़ रही है। इससे पार्टी की आगामी चुनावी रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं।
वहीं, विपक्षी दलों ने भी इस कमजोर पड़ती स्थिति का फायदा लेने के लिए अपनी तैयारियाँ तेज कर दी हैं। असम की राजनीतिक पटल पर नए गठबंधनों और रणनीतियों का प्रभाव भी एजीपी की सीटों पर सीधे असर डाल सकता है। सामने आ रही रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी को अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने और स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है, अन्यथा वह चुनाव में पिछड़ सकती है।
विपक्षी दलों के बढ़ते दबाव और असम की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए, एजीपी के नेतृत्व को नई रणनीतियाँ सोचने और पार्टी को फिर से उठाने का प्रयास करना होगा। आने वाले समय में एजीपी की भूमिका विधानसभा चुनावों में कितना प्रभावशाली रहती है, यह देखने वाली बात होगी।









