इंदौर दिगंबर जैन समाज में नेतृत्व का संकट—’मनोनीत’ बनाम ‘निर्वाचित’ की जंग

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विशेष रिपोर्ट: इंदौर दिगंबर जैन समाज में नेतृत्व का संकट—’मनोनीत’ बनाम ‘निर्वाचित’ की जंग

इंदौर। देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर की ‘सामाजिक संसद’ कहे जाने वाले दिगंबर जैन समाज में इन दिनों नेतृत्व और लोकतंत्र को लेकर गहरा मंथन चल रहा है। समाज के अध्यक्ष पद के चुनाव परिणाम आए कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन समाज के भीतर उपजा ‘भ्रम’ थमने का नाम नहीं ले रहा है। सवाल अब केवल पद का नहीं, बल्कि ‘नैतिकता’ और ‘प्रक्रिया’ का है।

मनोनीत और निर्वाचित: संवैधानिक वैधता का अंतर

समाज के प्रबुद्ध वर्ग और युवाओं के बीच यह चर्चा आम है कि ‘मनोनीत’ (Nominated) और ‘निर्वाचित’ (Elected) पदों के बीच की खाई बहुत बड़ी होती है। जहां मनोनीत पद किसी आपात स्थिति या अस्थायी व्यवस्था के लिए ‘ऊपर’ से थोपा जाता है, वहीं निर्वाचित पद लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनमत की शक्ति लेकर आता है।

समाज के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि जो व्यक्ति पहले ‘समन्वयक’ (अंपायर) की भूमिका में था, वह अचानक ‘कप्तान’ की दौड़ में कैसे शामिल हो सकता है? क्या यह अंपायर द्वारा स्वयं को ही विजेता घोषित करने जैसा नहीं है?

अव्यवस्थाओं ने पहुंचाई भावनाओं को ठेस

महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव जैसे पावन अवसर पर जो अव्यवस्थाएं देखने को मिलीं, उसने समाज के हर वर्ग को झकझोर कर रख दिया है। वात्सल्य भोज में जिस तरह समाजजनों को अव्यवस्थाओं का सामना करना पड़ा और खाली पेट लौटना पड़ा, वह प्रबंधन की बड़ी विफलता मानी जा रही है।

  • जवाबदेही का अभाव: घटना के 26 दिन बीत जाने के बाद भी जिम्मेदार पदाधिकारियों ने समाज के सामने आकर स्थिति स्पष्ट नहीं की है।

  • हंसी का पात्र: मंच और माला की होड़ में लगे पदाधिकारी यह भूल गए कि उनकी ‘झांकी-मंडप’ सजाने की हठधर्मिता ने समाज को हंसी का पात्र बना दिया है।

लोकतांत्रिक बहिष्कार और नैतिक संकट

समाज का एक बड़ा हिस्सा यह मानता है कि ‘मनोनीत अध्यक्ष’ का अस्तित्व उसी क्षण समाप्त हो गया था, जब पूर्व अध्यक्षों, कार्यकारिणी और स्वयं शासन-प्रशासन ने लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेकर इसे अपनी स्वीकृति दी थी। जब पूरा समाज मतदान कर अपना प्रतिनिधि चुन चुका है, तो मनोनीत पद पर टिके रहना समाज की भावनाओं और प्रजातांत्रिक मूल्यों का अपमान है।

अब निर्णय की घड़ी: विवेक या अहंकार?

वर्तमान में संपूर्ण जैन समाज के साथ-साथ शहर का व्यापारिक, राजनीतिक और शैक्षणिक वर्ग भी इस निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा है। कार्यकारिणी देव, शास्त्र और गुरु के समक्ष शपथ ले चुकी है, ऐसे में व्यक्तिगत अहंकार और पद की लालसा समाज के ताने-बाने को कमजोर कर रही है।

एक सजग कलमकार और समाज के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते, समाज हित में यह मांग उठ रही है कि अब ‘विवेक’ और ‘अनुभव’ को आगे रखकर उचित निर्णय लिया जाए। समाज किसी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि हजारों वर्षों के संस्कारों की विरासत है।


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Author: KPN News

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