एडीएचडी निदान में देरी: दशकों तक पहचान न हो पाने का सच
नई दिल्ली – (रिपोर्टर)
समाचार सारांश
एटेंशन डेफिसिट/हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) को आमतौर पर बचपन की एक स्थिति माना जाता है, लेकिन यह सोच पूरी तरह सही नहीं है। कई लोग अपनी पूरी जिंदगी इसके लक्षणों के साथ जीते हैं बिना यह जाने कि उन्हें एडीएचडी है। विशेषज्ञ बताते हैं कि इस मानसिक स्थिति का निदान कई दशकों तक छिपा रह सकता है, जिससे मरीजों की समस्याओं का समाधान देर से होता है।
एडीएचडी की पहचान में देरी के कारण
एडीएचडी अक्सर बचपन में पहचाना जाता है, लेकिन इसके लक्षण वयस्कों में भी बने रहते हैं। कई बार वयस्क इसे तनाव या अन्य सामान्य जीवन की समस्याओं के कारण होने वाले लक्षण समझ लेते हैं। इसके अलावा, देश में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी और सीमित संसाधनों के चलते निदान में देरी होती है। साथ ही, कुछ लोगों के लक्षण इतने हल्के होते हैं कि वे रोजमर्रा की जिंदगी में छिप जाते हैं और डॉक्टर तक पहुंचने में वर्षों लग जाते हैं।
विशेषज्ञों का दृष्टिकोण
मनोचिकित्सक डॉ. अंजलि मिश्रा के अनुसार, “एडीएचडी का निदान मुख्य रूप से बच्चों में होने के कारण वयस्कों में आमतौर पर इसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह जरूरी है कि हमें वयस्कों में भी इसकी पहचान करने के लिए सक्षम होना चाहिए।” इसके अलावा, एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि जागरूकता बढ़ाने और बेहतर मनोवैज्ञानिक सेवाएं मुहैया कराने से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
एडीएचडी का दीर्घकालीन प्रभाव
एडीएचडी का सही समय पर निदान न होने पर व्यक्ति की शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक जीवन प्रभावित होता है। इससे आत्मसम्मान की कमी, अवसाद और चिंता जैसी अन्य मानसिक बीमारियां भी हो सकती हैं। इसलिए विशेषज्ञ यह सलाह देते हैं कि अगर कोई लंबे समय से ध्यान केंद्रित करने में समस्या, बेचैनी, या कार्यों को पूरा न कर पाने जैसी स्थिति से जूझ रहा है तो उसे विशेषज्ञ से परामर्श जरूर लेना चाहिए।
इस तरह, एडीएचडी के प्रति सही समझ और उचित चिकित्सा से इस स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है और प्रभावित व्यक्ति की गुणवत्ता जीवन में सुधार संभव है।
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