सुरक्षा देने वाला ‘डिजिटल लॉक’ कहीं बन न जाए जान का दुश्मन!

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सावधान: सुरक्षा देने वाला ‘डिजिटल लॉक’ कहीं बन न जाए जान का दुश्मन!
खास रिपोर्ट: शैलेंद्र श्रीमाल, पत्रकार
इन्दौर। आधुनिकता के इस दौर में हम अपने घरों को ‘स्मार्ट’ बनाने की होड़ में लगे हैं। चाबियों के झंझट से मुक्ति पाने के लिए लोग अब दरवाजों पर डिजिटल और बायोमेट्रिक लॉक लगवा रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही स्मार्ट तकनीक कभी-कभी मौत का जाल भी बन सकती है? हाल ही में हुई कुछ घटनाओं ने इन डिजिटल तालों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कैसे बन रहे हैं ये दुर्घटना का कारण?
* आग लगने की स्थिति में ‘डेथ ट्रैप’: डिजिटल लॉक बिजली या बैटरी से चलते हैं। शॉर्ट सर्किट या घर में आग लगने की स्थिति में अक्सर इनका इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम फेल हो जाता है। ऐसे में दरवाजा अंदर से लॉक हो जाता है और चाहकर भी व्यक्ति बाहर नहीं निकल पाता।
* बैटरी डेड होना: कई बार लोग बैटरी लो होने के अलर्ट को नजरअंदाज कर देते हैं। अगर बैकअप की सुविधा न हो, तो इमरजेंसी में घर के अंदर या बाहर फंसने की नौबत आ जाती है।
* सॉफ्टवेयर ग्लिच और हैंगिंग: मोबाइल की तरह ये लॉक भी कभी-कभी ‘हैंग’ हो जाते हैं। तकनीकी खराबी के कारण फिंगरप्रिंट या कोड काम करना बंद कर देता है, जो बुजुर्गों और बच्चों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
* हैकिंग का खतरा: डिजिटल होने के कारण इन्हें प्रोफेशनल्स द्वारा हैक किया जा सकता है, जिससे चोरी की वारदातों में इजाफा हुआ है।
विशेषज्ञों की सलाह: बरतें ये सावधानियां
* मैनुअल ओवरराइड (Manual Override): हमेशा ऐसा डिजिटल लॉक चुनें जिसमें फिजिकल चाबी (Manual Key) का विकल्प भी हो।
* फायर सेंसर वाले लॉक: अच्छी क्वालिटी के लॉक में ‘फायर सेंसर’ होते हैं, जो तापमान बढ़ने पर अपने आप अनलॉक हो जाते हैं। हमेशा इन्ही का चयन करें।
* समय पर बैटरी बदलें: बैटरी लो होने का इंतजार न करें, उसे नियमित अंतराल पर बदलते रहें।
* सॉफ्टवेयर अपडेट: अपने स्मार्ट लॉक के ऐप और सॉफ्टवेयर को हमेशा अपडेट रखें ताकि बग्स दूर रहें।
निष्कर्ष:
सुविधा बुरी नहीं है, लेकिन तकनीक पर ‘अंधी निर्भरता’ जोखिम भरी हो सकती है। अपने घर की सुरक्षा चुनते समय समझदारी दिखाएं और इमरजेंसी एग्जिट का विकल्प हमेशा खुला रखें।
खबर पर नजर परिवार
प्रस्तुति: शैलेंद्र श्रीमाल “खुशी श्रीमाल”
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Author: KPN News

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