सेमाग्लूटाइड के भारत में आगमन पर BMI आधारित गाइडलाइंस पर विशेषज्ञों ने जताई चिंता
नई दिल्ली – (रिपोर्टर)
खबर का सार
भारत में सेमाग्लूटाइड नामक दवा के आने के साथ ही विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जो ग्लोबल बॉडी मास इंडेक्स (BMI) थ्रेशोल्ड तय किए गए हैं, वे कई उच्च जोखिम वाले भारतीय मरीजों को दवा के लाभ से वंचित कर सकते हैं। इन मानकों के तहत BMI सीमा पर आधारित नियमों के कारण संभावित रूप से गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों से जूझ रहे कई लोग इस उपचार योजना से बाहर रह सकते हैं।
घटना का विस्तार
सेमाग्लूटाइड, जो विशेष रूप से मोटापे और टाइप 2 मधुमेह के इलाज में उपयोगी मानी जाती है, हाल ही में भारत में उपलब्ध हो गई है। हालांकि, इसके लिए निर्धारित BMI कटऑफ वैश्विक निर्देशों पर आधारित हैं, जो अधिकांशतः पश्चिमी आबादी के स्वास्थ्य आंकड़ों पर आधारित हैं। भारत में मोटापे और संबद्ध बीमारियों का स्वरूप और उनका जोखिम अधिक जटिल है क्योंकि भारतीय आबादी में कम BMI पर भी स्वास्थ्य जोखिम बहुत अधिक होने की संभावना रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में उच्च जोखिम को नजरअंदाज करते हुए वर्तमान BMI सीमा तय करना गलत हो सकता है। यहां तक कि उन लोगों को भी जो कम BMI के बावजूद गंभीर रूप से बाधित हैं, यह दवा मिलने से वंचित रह सकते हैं।
संबंधित बयान/प्रतिक्रिया
विशेषज्ञों ने कहा, “भारत में शरीर के आकार और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ अलग हैं। हमने यह पाया है कि कम BMI में भी डायबिटीज और हार्ट डिजीज जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले लेती हैं। अगर दवा के लिए भी पश्चिमी दुनियाओं के मानकों का अनुकरण किया गया तो बड़ी संख्या में लाभार्थी दवा से वंचित रह सकते हैं। हमें स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए नियम बनाना चाहिए।” एक वरिष्ठ एंडोक्राइनोलॉजिस्ट ने जोर देकर कहा कि जरूरत है कि भारतीय विशिष्ट डेटा के आधार पर BMI थ्रेशोल्ड तय किए जाएं ताकि इस दवा का लाभ हर उस व्यक्ति को मिले जिसे इसकी जरूरत है।
अतिरिक्त जानकारी और प्रभाव
सेमाग्लूटाइड उस दवाओं में से एक है जिसे वैश्विक स्तर पर मोटापे और मधुमेह के इलाज में क्रांतिकारी माना जा रहा है। इसके भारत में hastel के कारण स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार की उम्मीद बढ़ी है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां मोटापा और मधुमेह की भारी संख्या है। फिर भी, अगर BMI आधारित गाइडलाइंस में संशोधन नहीं किया गया, तो यह एक बड़ी आबादी के लिए नुकसानदायक हो सकता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि दवा नीतियों को भारत के संदर्भ में पुनः मूल्यांकित करना आवश्यक है ताकि देश के स्वास्थ्य सुधार प्रयासों को पूरा किया जा सके और सभी उच्च जोखिम वाले मरीजों को उचित उपचार मिले।
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