एनसीईआरटी पुस्तक विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का पुनर्विचार
नई दिल्ली – (रिपोर्टर)
घटना का सार
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एनसीईआरटी की एक विवादित पाठ्यपुस्तक को लेकर दिए गए अपने ‘‘कड़े’’ टिप्पणियों और तीन शिक्षाविदों की ब्लैकलिस्टिंग पर पुनर्विचार किया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसके टिप्पणियां सामग्री के संदर्भ में थीं, न कि व्यक्तियों के लिए। यह मामला तब गरमा गया था जब मार्च 11 को एक आदेश पारित करते हुए तीन शिक्षाविदों की आलोचना की गई थी।
घटना का विस्तार
यह विवाद मार्च 2024 में शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की एक पुस्तक में शामिल कुछ अंशों की समीक्षा की और उसे ‘‘अनुचित’’ करार दिया। न्यायालय की टिप्पणियों के बाद, तीन राजनेताओं ने उन शिक्षाविदों को जिम्मेदार ठहराया जो इन अंशों के चयन में शामिल थे। हालांकि शिक्षाविदों का कहना है कि मार्च 11 का आदेश उनके पक्ष की सुनवाई के बिना, एकतरफा (ex parte) दिया गया था। उन्होंने यह भी बताया कि जांच में आए हिस्से पाठ्यपुस्तक में सामूहिक निर्णय के परिणामस्वरूप शामिल किए गए थे।
संबंधित बयान और प्रतिक्रियाएं
शिक्षाविदों ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को लेकर स्पष्ट किया कि वे व्यक्तिगत नहीं थे और केवल पाठ्यपुस्तक की सामग्री से जुड़ी थीं। उन्होंने न्यायालय से यह माँगा कि उनके विचारों को गलत तरीके से पेश न किया जाए। कोर्ट ने भी संकेत दिया कि उसका उद्देश्य किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाना नहीं था, बल्कि केवल अध्ययन सामग्री के संदर्भ में विचार करना था। इस बीच, शिक्षा मंत्रालय ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुए सुधारात्मक कदम उठाने की बात कही है।
अतिरिक्त जानकारी और प्रभाव
यह विवाद शिक्षा और पाठ्यक्रम निर्धारण के क्षेत्र में व्यापक चर्चा का विषय बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले ने शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता और सामूहिक निर्णय के महत्व को रेखांकित किया है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और चारों ओर की प्रतिक्रियाओं ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा प्रक्रिया को भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना दिया है। भविष्य में ऐसे मामलों में न्यायालय और अन्य संबंधित पक्षों के बीच संवाद और समझौते की उम्मीद की जा रही है।
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