New Delhi, Delhi
भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर और आतंकवाद को लेकर विवाद दशकों पुराना है। संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न मंचों पर दोनों देश समय-समय पर एक-दूसरे के खिलाफ आरोप लगाते रहे हैं। पाकिस्तान जहां कश्मीर को लेकर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश करता है, वहीं भारत उसके बयानों का जवाब सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे से देता रहा है।
कश्मीर विवाद पहली बार 1948 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सामने पहुंचा था। भारत का कहना रहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और पाकिस्तान के कब्जे वाले हिस्से पर उसका अवैध कब्जा है। पाकिस्तान इसके विपरीत संयुक्त राष्ट्र के पुराने प्रस्तावों और आत्मनिर्णय के अधिकार का हवाला देता रहा है।
आतंकवाद बना भारत का प्रमुख कूटनीतिक हथियार
भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कई मौकों पर पाकिस्तान पर आतंकवादी संगठनों को समर्थन देने का आरोप लगाया है। मुंबई के 26/11 हमले समेत कई आतंकी घटनाओं का उल्लेख करते हुए भारत ने वैश्विक मंच पर पाकिस्तान से आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की मांग की।
पाकिस्तान इन आरोपों को खारिज करता रहा है और वह भारत पर जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाता है।
संयुक्त राष्ट्र में ‘राइट टू रिप्लाई’
जब भी पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र महासभा या सुरक्षा परिषद में भारत के खिलाफ आरोप लगाता है, भारत कई मौकों पर Right to Reply के जरिए उसका जवाब देता है। भारतीय प्रतिनिधियों ने अपने बयानों में पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों, सीमा पार आतंकवाद और आतंकवादियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई का मुद्दा उठाया है।
हाल के वर्षों में भी कश्मीर और आतंकवाद को लेकर संयुक्त राष्ट्र में भारत-पाकिस्तान के बीच बयानबाजी तेज रही है। भारत ने यह रुख दोहराया है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते।
विवाद अभी भी जारी
संयुक्त राष्ट्र के मंच पर दोनों देशों की कूटनीतिक लड़ाई का मूल केंद्र कश्मीर और आतंकवाद ही रहा है। पाकिस्तान कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दे के रूप में उठाता है, जबकि भारत इसे आतंकवाद से जोड़कर पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाता है।
इस लंबे विवाद से यह स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक मुकाबले का एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है।










