लखनऊ, उत्तर प्रदेश
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने बड़ा राजनीतिक कदम उठाया है। पार्टी ने राज्य की सभी 403 विधानसभा सीटों पर संगठनात्मक तैयारी शुरू करने की घोषणा की है। हालांकि, पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी या किसी गठबंधन के साथ मैदान में उतरेगी, इस पर अभी अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं है।
एनडीए में शामिल चिराग पासवान का उत्तर प्रदेश में चुनावी विस्तार कई मायनों में महत्वपूर्ण है। वह गठबंधन में रहते हुए अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाए रखने पर जोर दे रहे हैं। हाल में चिराग पासवान ने कहा था कि वह गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन भाजपा नहीं हैं।
राष्ट्रीय राजनीति में विस्तार की कोशिश
चिराग पासवान की पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार की पांचों सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस प्रदर्शन के बाद केंद्र की राजनीति में उनकी स्थिति मजबूत हुई। अब उत्तर प्रदेश में सक्रियता बढ़ाकर वह अपनी पार्टी को बिहार से बाहर विस्तार देने की कोशिश कर रहे हैं।
नागालैंड विधानसभा चुनाव में भी एलजेपी ने दो सीटें जीती थीं और 8.6 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। ऐसे में उत्तर प्रदेश में संगठन विस्तार को पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर मौजूदगी बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
दलित वोट बैंक पर नजर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बहुजन समाज पार्टी के कमजोर प्रदर्शन के बाद इस राजनीतिक आधार में बने खालीपन को एलजेपी एक अवसर के तौर पर देख रही है।
हालांकि, उत्तर प्रदेश और बिहार के दलित सामाजिक समीकरण में अंतर है। उत्तर प्रदेश में पासी, वाल्मीकि और खटीक जैसे गैर-जाटव समुदायों की अलग राजनीतिक पहचान और सामाजिक पृष्ठभूमि है। चिराग पासवान अपनी युवा छवि के जरिए इन समुदायों और युवाओं को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रयागराज में आयोजित ‘यूथ बोले तो’ अभियान के दौरान उन्होंने युवाओं से जुड़े मुद्दे उठाए। उन्होंने परीक्षाएं रद होने पर विद्यार्थियों के यात्रा और रहने के खर्च की भरपाई को कानूनी अधिकार बनाने की मांग की।
बीजेपी के लिए क्या मायने?
अगर एलजेपी को एनडीए में अपेक्षित सीटें नहीं मिलती हैं और पार्टी अलग से चुनाव लड़ती है, तो कई सीटों पर वह वोटों के समीकरण को प्रभावित कर सकती है। उत्तर प्रदेश में कई मुकाबले बेहद करीबी होते हैं और कुछ हजार वोटों का अंतर भी परिणाम बदल सकता है।
ऐसे में गैर-जाटव दलित और युवा मतदाताओं के बीच एलजेपी की मौजूदगी चुनावी समीकरण पर असर डाल सकती है।
चिराग पासवान का यूपी दांव केवल सीट जीतने की कोशिश नहीं है। इसके जरिए वह अपनी पार्टी की स्वतंत्र पहचान बनाए रखने, एनडीए में अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने और बिहार से बाहर राष्ट्रीय स्तर पर अपना आधार तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।










