क्या है यूनिपोलर और बाइपोलर डिप्रेशन में अंतर? जानिए पूरी जानकारी

क्या है यूनिपोलर और बाइपोलर डिप्रेशन में अंतर? जानिए पूरी जानकारी

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डिप्रेशन के लक्षणों में उदासी, थकान, मन लगने में समस्या और नींद के बदलाव शामिल हैं, लेकिन हर डिप्रेशन एक जैसा नहीं होता। यूनिपोलर और बाइपोलर डिप्रेशन में लक्षण कुछ हद तक समान दिख सकते हैं, मगर इनके बीच काफी फर्क होता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि दोनों के बीच अंतर समझने के लिए व्यक्ति के मूड के इतिहास को देखना जरूरी होता है।

यूनिपोलर डिप्रेशन क्या होता है?

यूनिपोलर डिप्रेशन को मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर के रूप में जाना जाता है। इसमें व्यक्ति को एक या अधिक बार डिप्रेसिव एपिसोड का सामना करना पड़ता है, जिसमें लंबे समय तक उदासी और किसी भी काम में रुचि की कमी होती है। इस स्थिति में दैनिक जीवन प्रभावित हो सकता है, जैसे पढ़ाई, काम, या रिश्तों में उलझाव आना।

स्प्रिंगर नेचर के अनुसार, मेजर डिप्रेसिव एपिसोड कम से कम दो हफ्तों तक रहने वाला एक ऐसा दौर होता है जिसमें व्यक्ति को उदास मन, नींद या भूख में बदलाव और ऊर्जा की कमी महसूस होती है। इससे उसके सामाजिक और पेशेवर जीवन पर असर पड़ता है।

बाइपोलर डिप्रेशन और उसकी खासियत

बाइपोलर डिप्रेशन बाइपोलर डिसऑर्डर का डिप्रेसिव फेज होता है। इस बीमारी में डिप्रेसिव एपिसोड के साथ-साथ मेनिया या हाइपोमेनिया के एपिसोड भी आ सकते हैं। मेनिया या हाइपोमेनिया में व्यक्ति का मूड बहुत ऊँचा या चिड़चिड़ा हो जाता है, ऊर्जा असामान्य रूप से बढ़ जाती है, नींद कम लगती है, और बात करने की गति तेज हो जाती है।

एनआईएमएच के मुताबिक, बाइपोलर डिसऑर्डर में ये मेनिया या हाइपोमेनिया के दौर उलझे रहते हैं और इलाज के दौरान इन्हें समझना बेहद जरूरी होता है। हाइपोमेनिया मेनिया से कम गंभीर होता है फिर भी इसके प्रभाव मूड और एक्टिविटी पर स्पष्ट होते हैं।

मुख्य अंतर

यूनिपोलर डिप्रेशन में मुख्य रूप से डिप्रेसिव एपिसोड होते हैं और मेनिया या हाइपोमेनिया का इतिहास सामान्यत: नहीं होता। वहीं, बाइपोलर में डिप्रेसिव चरण के साथ मेनिया या हाइपोमेनिया के भी एपिसोड होते हैं। जांच में मरीज के मूड इतिहास, लक्षणों की गहराई और परिवार की जानकारी अहम मानी जाती है।

डॉक्टर्स बताते हैं कि सिर्फ लक्षणों को देखकर डिप्रेशन के दोनों प्रकारों को अलग करना मुश्किल हो सकता है। इसके लिए विस्तृत क्लीनिकल मूल्यांकन और मरीज की जीवन यात्रा को समझना जरूरी होता है।

कब लें मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह?

अगर उदासी, निराशा, नींद व भूख में बदलाव या थकान लंबे समय तक बनी रहे और जीवन की सामान्य दिनचर्या बाधित हो जाए, तो मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल से संपर्क करें। खासकर यदि कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति से गुजरा हो जहां नींद कम लगे, ऊर्जा बहुत बढ़ जाए और सोचने बोलने के तरीके में अचानक बदलाव आए, तो डॉक्टर को इसकी पूरी जानकारी दें।

अगर आत्महत्या के विचार आते हैं, तो यह एक आपात स्थिति है और तुरंत भरोसेमंद व्यक्ति या मेडिकल सेवा से मदद लेनी चाहिए। सही पहचान और समय पर इलाज से दोनों प्रकार के डिप्रेशन को बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जा सकता है।

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KPN News
Author: KPN News

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