मर्यादाओं की बलि चढ़ता मोहनखेड़ा महातीर्थ: जैन साधुओं की उपेक्षा और परंपरा उल्लंघन से समाज में उबाल
धार/राजगढ़। परम पूज्य दादा गुरुदेव श्रीमद्विजय राजेंद्रसूरीश्वरजी महाराज की तपोभूमि, श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ की गौरवशाली परंपराओं और सिद्धांतों पर वर्तमान प्रबंधन की कार्यशैली ने प्रश्नचिह्न लगा दिया है। तीर्थ की मर्यादा को लेकर उठ रहे विवादों ने तब और भी उग्र रूप ले लिया जब 2 फरवरी को एक विशेष आयोजन के दौरान न केवल जैन सिद्धांतों की अवहेलना हुई, बल्कि तीर्थ की रक्षा करने वाले जैन साधु-भगवंतों की गरिमा को भी ठेस पहुँचाई गई।
रसूखदारों के आगे प्रोटोकॉल दरकिनार
आरोप है कि ट्रस्टियों ने रसूखदारों को खुश करने की होड़ में उस मर्यादा को ही भुला दिया जिसके लिए यह तीर्थ जाना जाता है। तीर्थ के इतिहास में संभवतः यह पहली बार हुआ है जब जैन साधुओं को नीचा दिखाने जैसी स्थिति निर्मित हुई। चर्चा है कि आयोजन के दौरान सन्यासी जी और अन्य अतिथियों को जैन साधुओं से न मिलने देने के उद्देश्य से रातों-रात मार्ग तक परिवर्तित कर दिए गए। वीआईपी मेहमानों को पिछले रास्तों से ले जाना और साधु-भगवंतों की उपस्थिति की अनदेखी करना यह दर्शाता है कि प्रबंधन के लिए अब अध्यात्म से बड़ा राजनीति और व्यक्तिगत रसूख हो गया है।
सिद्धांतों की उड़ी धज्जियां
विवाद केवल यहीं तक सीमित नहीं है। जैन धर्म के प्राण कहे जाने वाले ‘रात्रि भोजन त्याग’ के सिद्धांत की मोहनखेड़ा जैसे पवित्र धाम में सरेआम धज्जियां उड़ीं। रात 10 बजे तक चली भोजनशाला ने श्रद्धालुओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या यह तीर्थ अब केवल एक व्यावसायिक केंद्र बनकर रह गया है? गुरु मंदिर की पवित्रता, जहाँ कभी केवल गुरु-भक्ति की गूँज होती थी, अब वहां सांसारिक व्यक्तियों और राजनेताओं के महिमामंडन ने जगह ले ली है।
गौशाला की दुर्दशा और पहचान मिटाने का प्रयास
इसके साथ ही, तीर्थ की मूल पहचान ‘आदिनाथ राजेंद्र जैन श्वेतांबर पेढ़ी’ के नाम को विस्मृत करने का प्रयास और पूज्य ऋषभचंद्र सूरीजी म.सा. द्वारा स्थापित गौशाला की दुर्दशा ने प्रबंधन की संवेदनहीनता को उजागर किया है। समाज के प्रबुद्ध वर्गों ने कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि मोहनखेड़ा की प्राचीन गरिमा और गुरुदेव के सिद्धांतों की पुनर्स्थापना नहीं हुई, तो आने वाले समय में ट्रस्ट को समाज के व्यापक विरोध का सामना करना पड़ेगा।
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खबर पर नजर पत्रकार शैलेंद्र श्रीमाल









