छात्र तब बेहतर सीखते हैं जब उन्हें संकल्पित किया जाता है, अपमानित नहीं
नई दिल्ली – (रिपोर्टर)
खबर का सार
शिक्षा के क्षेत्र में एक नया शोध बताता है कि बच्चों को अपमानित कर सुधारने की बजाय उन्हें प्रोत्साहित कर चुनौती देना अधिक प्रभावी होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अपमानित करने वाली भाषा या व्यवहार बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को बाधित करती है और उनका आत्मविश्वास कम करती है। इसके विपरीत, सकारात्मक सुदृढ़ीकरण और चुनौती बच्चों की सीखने की क्षमता को बढ़ाते हैं।
घटना का विस्तार
शिक्षा जगत में हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि उन विद्यालयों में जहां शिक्षक बच्चों को गलती पर शर्मिंदा करने की बजाय प्रोत्साहित करते हैं, वहां छात्र बेहतर प्रदर्शन करते हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि अपमानित कर सुधारने की प्रवृत्ति न केवल बच्चों की समझ को प्रभावित करती है, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है। इसके अलावा बच्चों में डर और हतोत्साह बढ़ता है, जिससे उनकी प्रतिभा झलकने का अवसर कम हो जाता है।
प्रतिक्रिया
शिक्षक और मनोवैज्ञानिक इस विषय पर एकमत हैं। सुप्रिया वर्मा, बाल मनोवैज्ञानिक, कहती हैं, “जब बच्चों को उनकी क्षमताओं को पहचानने और चुनौती देने का मौका मिलता है, तो वे सीखने में ज्यादा सक्रिय और उत्सुक होते हैं। अपमानजनक व्यवहार उनके आत्मसम्मान को हानि पहुंचाकर सीखने के रास्ते में बाधा बनता है।” कई शिक्षकों ने भी यह स्वीकार किया कि सकारात्मक अप्रोच बच्चों की रुचि और समझ दोनों को बढ़ावा देती है।
अतिरिक्त जानकारी और प्रभाव
राज्य सरकारें भी अब इस दिशा में कदम उठा रही हैं। कुछ स्कूलों में प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं ताकि शिक्षक बच्चों के साथ बेहतर संवाद कर सकें और उन्हें योग्य चुनौती प्रदान कर सकें। विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस बदलाव से न केवल बच्चों के अकादमिक परिणाम बेहतर होंगे, बल्कि उनकी सामाजिक और भावनात्मक विकास पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। समस्त शिक्षा व्यवस्था को जल्द ही इस नए दृष्टिकोण को अपनाना होगा ताकि बच्चों की सीखने की प्रक्रिया और अनुभव दोनों बेहतर हो सकें।
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