नींद साक्षरता को सभी शैक्षिक पाठ्यक्रमों का हिस्सा क्यों बनाया जाना चाहिए

Why sleep literacy should be a part of all academic curricula

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रात में मोबाइल और अन्य गैजेट्स के अत्यधिक उपयोग पर संस्थागत जागरूकता और शैक्षिक भागीदारी जरूरी

नई दिल्ली – (रिपोर्टर)

खबर का सार

आज के डिजिटल युग में बच्चों और युवाओं में रात के समय मोबाइल फोन, टैबलेट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के अत्यधिक उपयोग की समस्या तीव्रता से बढ़ रही है। इस समस्या के प्रभाव स्वरूप नींद की कमी, मानसिक तनाव और शैक्षिक प्रदर्शन में गिरावट जैसी समस्याएं उभर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे को अकेले परिवार या व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि संस्थागत जागरूकता और शैक्षिक पाठ्यक्रमों में समेकित रूप से संबोधित किया जाना चाहिए।

घटना का विस्तार

भारत सहित विश्वभर के कई देशों में बच्चों की नींद पर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रभावों को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। अध्यात्यशास्त्रों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रात को देर तक फोन या लैपटॉप के स्क्रीन की नीली रोशनी मस्तिष्क में मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को प्रभावित करती है, जिससे नींद की गुणवत्ता गिरती है। इसके चलते न केवल शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है, बल्कि सीखने की क्षमता एवं मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ता है। हालांकि घरों में माता-पिता द्वारा इस पर नियंत्रण आवश्यक है, मगर केवल यही उपाय पर्याप्त नहीं साबित हो रहे।

संबंधित बयान/प्रतिक्रिया

नींद विशेषज्ञ डॉ. अनुराधा मिश्रा कहती हैं, “संस्थानात्मक जागरूकता के बिना इस समस्या को मिटाना मुश्किल है। स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में नींद साक्षरता को शामिल करना आवश्यक है ताकि युवा अपनी नींद की आदतों के प्रति जागरूक हों और सही निर्णय ले सकें।” शैक्षिक संस्थान छोटी उम्र से ही उचित संज्ञानात्मक व्यवहारिक शिक्षा मुहैया कराकर इस समस्या को जड़ से खत्म कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए अध्यापकों और अभिभावकों के सहयोग की भी जरूरत है।

अतिरिक्त जानकारी या प्रभाव

प्रतिष्ठित स्वास्थ्य एवं शिक्षा संगठनों ने नींद से जुड़ी जागरूकता बढ़ाने के लिए कई पहल किए हैं। कई देशों में इसे राष्ट्रीय शैक्षिक नीतियों में शामिल किया जा रहा है। भारत में भी इस दिशा में जोर दिया जा रहा है कि केवल टेक्नोलॉजी का उपयोग सीमित करने के बजाय, स्मार्टनेस के साथ शिक्षा दी जाए। इससे न केवल शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार होगा बल्कि बच्चों का समग्र मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य भी बेहतर होगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि स्कूलों में नियमित वर्कशॉप, सेमिनार और बच्चों के लिए संवाद सत्र आयोजित किए जाएंगे ताकि नींद के महत्व को समझा जा सके। परिणामस्वरूप, यह नीति युवा पीढ़ी को सुरक्षित और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करेगी।

समय की मांग है कि हम इस समस्या को एक सतत और व्यापक दृष्टिकोण से देखें ताकि आधुनिक जीवनशैली के नकारात्मक प्रभावों को रोका जा सके और बच्चों एवं युवाओं को बेहतर भविष्य की ओर अग्रसर किया जा सके।

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KPN News
Author: KPN News

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