ब्रिटेन में सीज़नल स्ट्रॉबेरी मजदूर अब मध्य एशियाई देशों से आ रहे हैं
लंदन – (रिपोर्टर)
खबर का सार
ब्रेक्सिट के दस साल बाद, ब्रिटेन के स्ट्रॉबेरी खेतों में अब ज्यादातर सत्रीय मजदूर किर्गिज़िस्तान और ताजिकिस्तान जैसे मध्य एशियाई देशों से आते हैं। ब्रिटिश कृषि उद्योग का कहना है कि बिना इन बाहरी श्रमिकों के कई खेत अपने उत्पादन को बनाए रखने में असफल हो जाएंगे। यह बदलाव ब्रिटेन के कृषि क्षेत्र और उससे जुड़े हजारों मजदूरों के जीवन में महत्वपूर्ण प्रभाव डाल रहा है।
घटना का विस्तार
ब्रिटेन के पारंपरिक श्रम स्रोतों से श्रमिकों की कमी ने कृषि क्षेत्र को पिछले दशक में बड़े बदलाव के लिए मजबूर किया है। इसकी प्रमुख वजह है यूरोपीय संघ से अलगाव (ब्रेक्सिट) के बाद यूरोपीय श्रमिकों का कम आना। परिणामस्वरूप, खेत मालिक अब मध्य एशियाई देशों से आने वाले श्रमिकों पर निर्भर हो गए हैं। ये मजदूर खासकर स्ट्रॉबेरी जैसे संवेदनशील फसलों की कटाई में काम करते हैं, जिससे फसलों की गुणवत्ता और निरंतरता बनी रहती है। कृषि प्रमुखों ने बताया है कि ये श्रमिक खेतों के लिए आवश्यक साबित हो रहे हैं, जिससे उत्पादन श्रृंखला में बड़ी बाधा नहीं आती।
संबंधित बयान/प्रतिक्रिया
ब्रिटेन कृषि परिषद के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “मध्य एशियाई मजदूरों की भागीदारी ने ब्रिटेन के खेतों को एक नई जान दी है। वे न केवल मेहनती हैं बल्कि खेती के काम में बड़ी दक्षता भी लाते हैं। बिना उनके, किसानों को काफी नुकसान सहना पड़ सकता था।” वहीं कुछ स्थानीय श्रमिकों का मानना है कि विदेशी श्रमिकों की वृद्धि से स्थानीय रोजगार के अवसर सीमित हो रहे हैं। सरकार ने इस मुद्दे पर आपूर्ति श्रृंखला को बेहतर बनाने और सभी पक्षों के हितों को संतुलित करने के लिए कदम उठाने का आश्वासन दिया है।
अतिरिक्त जानकारी या प्रभाव
कृषि क्षेत्र में इस बदलाव का असर न केवल किसानों और श्रमिकों पर पड़ा है, बल्कि ब्रिटेन की आर्थिक नीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को सत्रीय श्रमिकों की संख्या और स्थिति को ध्यान में रखते हुए नीतिगत सुधार करने होंगे ताकि कृषि क्षेत्र स्थिर और टिकाऊ रहे। इसके साथ ही, यह भी देखा जा रहा है कि मध्य एशियाई देशों के प्रति ब्रिटेन का यह रुख दोनों पक्षों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत कर सकता है। भविष्य में इस क्षेत्र की विकास गति पर यह निर्भर करेगा कि सरकार और कृषि क्षेत्र इन चुनौतियों का कैसे सामना करते हैं।
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