राष्ट्रीय हथकरघा दिवस: बंदा जनजाति की रिंगा बुनाई परंपरा की अनूठी यात्रा
ओडिशा, भारत – (रिपोर्टर)
खबर का सार
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर ओडिशा की बंदा जनजाति की महिलाओं द्वारा संरक्षित रिंगा बुनाई कला को प्रमुखता से देखने का अवसर मिला है। यह बुनाई शिल्प न केवल उनके सांस्कृतिक पहचान की प्रतिमूर्ति है, बल्कि उनकी आर्थिक आज़ादी का भी आधार है। इस पारंपरिक हस्तशिल्प ने पीढ़ी दर पीढ़ी महिला कलाकारों के माध्यम से जीवित रहकर अपनी एक विशिष्ट छवि बनाई है।
घटना का विस्तार
बंदा जनजाति के कई गाँवों में बुनकरी की यह परंपरा बड़े ही परिश्रम और धैर्य के साथ निभाई जाती है। महिलाओं द्वारा बनायी गई रिंगा बुनाई खास तरह का हथकरघा तकनीक उपयोग करते हुए तैयार की जाती है, जिसमें प्राकृतिक रंगों और विशिष्ट डिजाइनों की छवि उभरती है। इस कला को संरक्षित रखने के लिए कई स्थानीय प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें प्रशिक्षण शिविर और बाजार तक पहुँच बनाने की पहल शामिल हैं। इस बुनाई की खासियत यह है कि यह सिर्फ एक वस्त्र नहीं, बल्कि बंदा समुदाय की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिबिंब है।
प्रतिक्रिया एवं बयान
बन्दा जनजाति की महिलाओं और समुदाय के प्रमुखों का मानना है कि रिंगा बुनाई को देश व विदेश में पहचान दिलाने की जरूरत है। ‘‘यह पारंपरिक कला हमारी पहचाने की बड़ी वजह है और इसे बचाकर रखना हमारा धर्म है,’’ एक बुजुर्ग महिला कलाकार ने कहा। स्थानीय प्रशासन ने भी इस कला को संरक्षित करने के लिए विभिन्न योजनाएं बनाने की बात कही है ताकि हथकरघा उद्योग को पुनः जीवित किया जा सके।
अतिरिक्त जानकारी और प्रभाव
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस की पहल से बंदा जनजाति की रिंगा बुनाई को नया जीवन मिला है। इसके प्रचार-प्रसार और बाजार विस्तार के जरिए कई युवतियां इस कला को सीख रही हैं और रोजगार के अवसर हासिल कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की परंपरागत कलाओं को बचाने से न केवल सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहती है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है। इसलिए इस परंपरा के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए सरकार और समाज को मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है।
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