नई दिल्ली, दिल्ली। देश की राजनीति में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस कार्य समिति (CWC) द्वारा अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल पहले दो पद गाने के फैसले के बाद बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने आ गई हैं।
कांग्रेस के इस निर्णय के बाद राजनीतिक सवाल यह उठ रहा है कि क्या पार्टी राष्ट्रवाद के मुद्दे पर बीजेपी की बनाई रणनीति में फंस रही है या फिर उसने सोच-समझकर ऐसा राजनीतिक दांव चला है, जिसका असर आने वाले चुनावों और सामाजिक समीकरणों पर पड़ सकता है।
बीजेपी ने कांग्रेस को घेरा
कांग्रेस के फैसले के बाद बीजेपी ने तुरंत आक्रामक रुख अपनाया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा सहित पार्टी के कई नेताओं ने कांग्रेस की आलोचना की और उस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने के आरोप लगाए।
बीजेपी के लिए राष्ट्रवाद का मुद्दा लंबे समय से महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार रहा है। पार्टी राष्ट्रीय प्रतीकों, सांस्कृतिक विरासत और देशभक्ति से जुड़े मुद्दों को लेकर कांग्रेस की राजनीति पर सवाल उठाती रही है। ऐसे में वंदे मातरम् विवाद बीजेपी के लिए कांग्रेस को घेरने का नया अवसर बन सकता है।
कांग्रेस के लिए राजनीतिक जोखिम
कांग्रेस के सामने अब दोहरी चुनौती है। पहली, उसे अपने फैसले के पीछे की सोच को स्पष्ट करना होगा। दूसरी, बीजेपी के आरोपों का जवाब भी देना होगा।
यदि कांग्रेस अपना पक्ष मजबूती और स्पष्टता के साथ नहीं रखती है तो यह विवाद उसके लिए राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकता है। बीजेपी इसे जनता के बीच राष्ट्रवाद से जुड़े बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकती है।
क्या कोई बड़ा चुनावी दांव?
हालांकि, कांग्रेस की रणनीति को केवल बचाव की राजनीति मानना भी जल्दबाजी होगी। संभव है कि पार्टी ने विभिन्न सामाजिक समूहों और अपने राजनीतिक समर्थक आधार को ध्यान में रखते हुए यह फैसला किया हो।
कांग्रेस यदि इस मुद्दे को संविधान, राष्ट्रीय परंपरा और राजनीतिक विविधता की बहस से जोड़ती है तो वह बीजेपी के हमलों का वैचारिक जवाब देने की कोशिश कर सकती है।
फिलहाल वंदे मातरम् विवाद ने दोनों प्रमुख दलों के बीच वैचारिक टकराव को फिर सामने ला दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस इस मुद्दे को कैसे संभालती है और बीजेपी इसे कितना बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना पाती है।









