New Delhi, Delhi
भारत और इजरायल के संबंधों में ऐसे कई प्रसंग रहे हैं, जब भारतीयों ने इजरायली नागरिकों की जान बचाने के लिए असाधारण साहस दिखाया। इतिहास में 1918 की हाइफा की लड़ाई और 2008 के मुंबई आतंकी हमले की घटनाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 23 सितंबर 1918 को हाइफा की लड़ाई में भारतीय सैनिकों ने ओटोमन साम्राज्य की सेना के खिलाफ निर्णायक भूमिका निभाई थी। इस अभियान में जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद लांसर्स सहित भारतीय रियासतों की लांसर रेजिमेंटों ने हिस्सा लिया था।
15वीं इंपीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड के भारतीय घुड़सवारों ने मशीनगनों से लैस ओटोमन और जर्मन ठिकानों पर भाले, तलवार और बरछियों के साथ हमला किया था। इस कार्रवाई का नेतृत्व मेजर दलपत सिंह ने किया था। वह लड़ाई में शहीद हो गए और उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत सैन्य सम्मान दिया गया।
भारतीय सैनिकों की कार्रवाई से हाइफा और एकर पर कब्जा करने में मदद मिली और ओटोमन की महत्वपूर्ण आपूर्ति लाइनों को नुकसान पहुंचा। भारतीय सेना हर साल 23 सितंबर को हाइफा दिवस के रूप में इस लड़ाई में शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देती है।
करीब 90 वर्ष बाद मुंबई में भी एक भारतीय महिला ने आतंकियों के बीच एक इजरायली बच्चे की जान बचाई। 26 नवंबर 2008 को मुंबई में आतंकी हमला हुआ था। दक्षिण मुंबई के कोलाबा स्थित चाबाड हाउस को भी निशाना बनाया गया था।
वहां दो वर्षीय मोशे होल्त्ज्तबर्ग की देखभाल भारतीय महिला सांद्रा सैमुअल कर रही थीं। आतंकियों ने मोशे के माता-पिता समेत छह लोगों की हत्या कर दी थी। गोलीबारी के बीच सांद्रा मोशे को गोद में लेकर बाहर निकल आईं और उसकी जान बचाई।
सांद्रा सैमुअल की बहादुरी के सम्मान में इजरायल ने उन्हें नागरिकता प्रदान की।










