नाना पाटेकर से बातचीत करना महज किसी अभिनेता से बात करने जैसा नहीं होता। उनके संवादों में सीधा अनुभव और बेबाकी झलकती है। दिल्ली टाइम्स मसाला मिक्स के दफ्तर पहुंचकर साल 2015 में दी गई बातचीत में नाना ने फिल्मों, राजनीति, नई पीढ़ी और तकनीक पर खुलकर बात की। उन्होंने अपने अभिनय के साथ-साथ समाज और राजनीति के प्रति अपने विचार भी साझा किए।
असली जिंदगी के करीब किरदार
नाना पाटेकर ने अपने अभिनय व्यक्तित्व की बात करते हुए कहा कि उनके लिए सिनेमा में हीरो होना असंभव कारनामे करने जैसा नहीं है। वे चाहते हैं कि उनके पात्र असली जिंदगी से जुड़े हों। पुलिसवाले जैसा प्रचारित उनका किरदार भी उनकी व्यक्तिगत सोच को दर्शाता है, जहां वह सुपरहीरो जैसे डायलॉग नहीं कहते, बल्कि वास्तविकता के करीब रहते हैं।
राजनीति में आने के कई प्रस्ताव मिलने के बावजूद उन्होंने सभी ठुकरा दिए। उनका कहना था कि अगर वह पार्टी में होते और कुछ गलत होता, तो उन्हें उसका बचाव करना पड़ता, जो उनके लिए सम्भव नहीं है। इसलिए नाना का मानना है कि उन्हें सामाजिक मुद्दों पर बोलने के लिए राजनीति में जाने की जरूरत नहीं है। सिनेमा उनके विचारों को पहुंचाने का बेहतर माध्यम है।
नई पीढ़ी की सोच और तकनीक पर नजर
नाना पाटेकर ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी बहुत जागरूक है और सवाल पूछती है। पहले की तुलना में वे पांच साल या लंबा इंतजार नहीं करती। उन्होंने क्रिकेट के उदाहरण से बताया कि जितना पहले लोगों को हार के बाद भी छोटी उपलब्धियों में संतोष होता था, अब युवा पूरा परिणाम चाहते हैं। इससे राजनेताओं को भी वादे सोच-समझकर करने होंगे।
तकनीक के बदलते दौर पर भी नाना ने अपनी बात रखी। उन्होंने हंसते हुए कहा कि वे खुद को सीनियर सिटीजन मानते हैं, क्योंकि मोबाइल और इंटरनेट का कम इस्तेमाल करते हैं। उनका मानना है कि फोन और इंटरनेट में उलझ जाने से लोगों के चेहरे पढ़ना मुश्किल हो जाता है, जो एक कलाकार के लिए सबसे जरूरी है।
नाना पाटेकर ने कहा, “मैं फोन में नहीं, लोगों के चेहरों में डाउनलोड करता हूं।” उनके लिए लोगों के भाव ही उनके अभिनय की असली पूंजी हैं, जिन्हें कम्प्यूटर कभी इस तरह कैद नहीं कर सकता।
सोशल मीडिया और लोकप्रियता को लेकर वे उत्साहित नहीं दिखे। नाना के अनुसार, प्रसिद्धि का अर्थ हमेशा खुद को प्रदर्शित करना नही होता। उनका कहना है कि वे कैमरा ऑन होने पर अभिनेता हैं, पर बंद होने पर एक आम आदमी। इसका कारण यह है कि स्टार बनने से ज्यादा इंसान बने रहना जरूरी है।
नाना की यह सादगी और बेबाकी उनकी सबसे बड़ी खासियत रही। फिल्मों के संवादों में उनके विचार सीधे दर्शकों के दिलों तक पहुंचते। उनके अनुसार उनका चेहरा, उनकी आवाज और उनकी नजर ही उनकी सबसे बड़ी “बंदूक” है। आज की युवा पीढ़ी की बदलती सोच और उनकी अपेक्षाएं नेताओं के लिए नए सिरे से चुनौती पेश करती हैं। युवाओं का धैर्य कम हो गया है और वे सिर्फ वादों से संतुष्ट नहीं हैं।










