दिगंबर संत आहार कैसे लेते हैं? | आचार्य सुनील सागर जी

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दिगंबर संत आहार कैसे लेते हैं? | आचार्य सुनील सागर जी

दिगंबर संत आहार कैसे लेते हैं? | आचार्य सुनील सागर जी

जैन धर्म की दिगंबर परंपरा में मुनियों की दिनचर्या अत्यंत कठोर और संयम से भरी होती है। उसी चर्या का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है — आहार। खबर पर नजर के इस वीडियो में देखिए आचार्य श्री सुनील सागर जी की आहार चर्या, जहां श्रावक-श्राविकाएं पूरी श्रद्धा और विधि के साथ संत को आहार दान दे रहे हैं।

दिन में केवल एक बार आहार

दिगंबर मुनि दिन में केवल एक बार आहार लेते हैं। यह आहार सूर्यास्त से पहले, निश्चित समय पर और पूरी विधि के साथ ग्रहण किया जाता है। आहार का उद्देश्य स्वाद नहीं, केवल शरीर को साधना के योग्य बनाए रखना होता है — इसीलिए संत भोजन को लेकर पूर्णतः निरपेक्ष रहते हैं।

नवधा भक्ति और स्थितिभोजन

आहार से पहले श्रावक नवधा भक्ति करते हैं — संत का स्वागत, पाद-प्रक्षालन से लेकर आहार अर्पण तक की नौ प्रकार की भक्ति-विधि। सबसे विशेष बात यह है कि दिगंबर संत किसी बर्तन में नहीं खाते। वे खड़े होकर, दोनों हाथों की अंजुलि — यानी कर-पात्र — में ही आहार ग्रहण करते हैं। खड़े होकर भोजन करने की इस विधि को स्थितिभोजन कहा जाता है। वीडियो में आचार्य श्री अपने स्थान पर खड़े हैं और श्रद्धालु एक-एक करके थाली से विधिपूर्वक आहार अर्पित कर रहे हैं।

पहले जल, फिर सात्विक भोजन

विधि के अनुसार सबसे पहले संत को जल दिया जाता है। दिगंबर संत उबला हुआ प्रसुक जल ही ग्रहण करते हैं, ताकि किसी भी सूक्ष्म जीव की हिंसा न हो। थाली में सात्विक भोजन होता है — बिना लहसुन-प्याज़ के, पूरी शुद्धि और सावधानी के साथ बनाया हुआ। आहार देने वाला भी शुद्ध वस्त्रों में, पूरी मर्यादा के साथ ही यह दान देता है।

आहार दान — महादान

संत मौन रहकर, पूर्ण संयम के साथ आहार ग्रहण करते हैं। जैन धर्म में आहार दान को महादान माना गया है, क्योंकि संत की साधना, तप और अध्ययन इसी दान से चलता है। श्रद्धालुओं के लिए यह अवसर जीवन के सबसे पुण्य कार्यों में गिना जाता है — वीडियो में दिख रही श्रद्धा और अनुशासन इसी भावना को दर्शाता है।

ऐसी है दिगंबर संतों की कठोर और प्रेरक दिनचर्या — जो संयम, अहिंसा और त्याग का जीवंत उदाहरण है।

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Author: KPN News

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