सूरत, गुजरात
भारत और दुनिया के बीच व्यापार का इतिहास कई सदियों पुराना है। प्राचीन समय से ही भारत के मसाले, कपड़े, रेशम, कपास और नील जैसी वस्तुएं समुद्री रास्तों के जरिए दूसरे देशों तक पहुंचती रही हैं। भारतीय सामान की मांग इतनी अधिक थी कि यूरोप और एशिया के कई हिस्सों से व्यापारी भारत पहुंचते थे। हालांकि उस दौर में व्यापार मुख्य रूप से अलग-अलग व्यापारियों और कारोबारी समूहों के माध्यम से होता था।
जब संगठित और बड़े स्तर पर विदेशी व्यापार की बात आती है, तो ईस्ट इंडिया कंपनी का नाम प्रमुखता से सामने आता है। कंपनी की स्थापना 1600 में इंग्लैंड में हुई थी और इसके बाद उसने भारत में व्यापारिक गतिविधियां शुरू कीं। 17वीं सदी में कंपनी ने भारत के प्रमुख बंदरगाहों में अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित किए, जिनमें सूरत भी महत्वपूर्ण था।
भारत के मसालों और कपड़ों की थी भारी मांग
ईस्ट इंडिया कंपनी भारतीय बाजार से मसाले, सूती और रेशमी कपड़े, नील तथा दूसरी बहुमूल्य वस्तुएं खरीदकर समुद्री रास्तों से विदेशों तक पहुंचाती थी। उस समय भारतीय कपड़ों और मसालों की यूरोपीय बाजारों में काफी मांग थी। भारत के वस्त्र विशेष रूप से अपनी गुणवत्ता और बारीक कारीगरी के लिए प्रसिद्ध थे।
सूरत उस दौर में समुद्री व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। यहां से माल जहाजों के जरिए पश्चिम एशिया और यूरोप के बाजारों तक पहुंचता था। इस व्यापार से कंपनी को भारी मुनाफा हुआ और भारत के साथ उसका कारोबारी संबंध लगातार मजबूत होता गया।
व्यापार से सत्ता तक पहुंची कंपनी
ईस्ट इंडिया कंपनी की शुरुआत एक व्यापारिक संस्था के रूप में हुई थी, लेकिन समय के साथ उसकी गतिविधियां केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहीं। कंपनी ने भारत में राजनीतिक और सैन्य प्रभाव बढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे उसने कई भारतीय क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
यही वजह है कि भारत के निर्यात और समुद्री व्यापार के इतिहास में ईस्ट इंडिया कंपनी का नाम महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ औपनिवेशिक इतिहास से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। हालांकि भारत से विदेशी व्यापार कंपनी के आने से बहुत पहले से मौजूद था, लेकिन कंपनी ने इसे एक बड़े संगठित कारोबारी ढांचे में विस्तार दिया और भारतीय वस्तुओं को यूरोपीय बाजारों तक बड़े पैमाने पर पहुंचाया।









