कुल्लू, हिमाचल प्रदेश। देशभर में विजयदशमी का पर्व रावण दहन और रामलीला के साथ मनाया जाता है, लेकिन हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरे की परंपरा बिल्कुल अलग है। यहां न रामलीला का मंचन होता है और न ही रावण का पुतला जलाया जाता है। कुल्लू में विजयदशमी के एक दिन बाद सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव का आगाज होता है। यह आयोजन सदियों पुरानी देव मिलन परंपरा के लिए प्रसिद्ध है।
300 से अधिक देवी-देवता होते हैं शामिल
कुल्लू दशहरे की सबसे बड़ी विशेषता देव समागम है। इस दौरान 300 से अधिक देवी-देवता अपने-अपने क्षेत्रों से पहुंचकर भगवान रघुनाथ जी के दरबार में हाजिरी भरते हैं। इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। देवी-देवताओं के एक स्थान पर एकत्र होने की परंपरा कुल्लू दशहरे को देश के दूसरे दशहरा उत्सवों से अलग पहचान देती है।
सातवें दिन निभाई जाती है विशेष परंपरा
उत्सव के अंतिम दिन ब्यास नदी के किनारे लंका बेकर में विशेष धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं। यहां अष्टांग बलि की औपचारिकता के बाद घास-फूस और झाड़ियों के तीन अलाव जलाए जाते हैं। यह परंपरा सामान्य दशहरा आयोजनों में होने वाले रावण दहन से अलग है।
इसके बाद भगवान रघुनाथ जी रथ पर सवार होकर मंदिर लौटते हैं। देव समागम में शामिल देवी-देवता भी अपने-अपने देवालयों की ओर प्रस्थान करते हैं। इस तरह सात दिनों तक चलने वाला धार्मिक आयोजन परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ संपन्न होता है।
भगवान रघुनाथ जी से जुड़ा है इतिहास
कुल्लू दशहरे की धार्मिक परंपरा में भगवान रघुनाथ जी का विशेष स्थान है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1649 में भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति अयोध्या से कुल्लू लाई गई थी। इसके बाद से यह परंपरा क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।
कुल्लू दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं, देव मिलन और ऐतिहासिक महत्व के कारण देशभर में अलग पहचान रखता है।









