खबर पर नजर: नाकोड़ा राष्ट्रीय अधिवेशन – चिंतन का विषय

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🚩 खबर पर नजर: नाकोड़ा राष्ट्रीय अधिवेशन – चिंतन का विषय

विषय: जैन सोशल ग्रुप : मंच पर शोर, मन में सूनापन 🛑

जैन सोशल ग्रुप के नाकोड़ा तीर्थ की पावन धन्यधरा में राष्ट्रीय अधिवेशन में हाल ही में जो दृश्य सामने आया, वह केवल एक आयोजन की अव्यवस्था नहीं था, बल्कि जैन समाज की वैचारिक गिरावट का संकेतक क्षण था।

मंच से जब बौद्धिक संगत, धर्म, संस्कार और तीर्थ चेतना की बात रखी गई, तो सभागृह में बैठी भीड़ को यह “नीरस” लगने लगी।

👉 ज्ञान बोझ बन गया और विचार असहज।

यह प्रश्न स्वाभाविक है:

यदि जैन समाज के मंच पर ही जैन दर्शन की बात नागवार लगे, तो फिर ऐसे मंच का औचित्य क्या है?

कुछ क्षणों के लिए ऐसा प्रतीत हुआ मानो सभागृह में उपस्थित जनसमूह जैन समाज का प्रतिनिधि ही नहीं है। अहिंसा, संयम और आत्मशुद्धि जैसे मूल सिद्धांतों पर चर्चा होते ही असहजता फैल गई।

🔇 हल्ला, शोर और आपत्ति…!

यह प्रतिक्रिया किसी वैचारिक असहमति की नहीं, बल्कि संस्कारहीन मानसिकता की प्रतीक थी। विडंबना यह है कि आज “मोटिवेशन” के नाम पर केवल भौतिक सफलता, पद, प्रतिष्ठा और उपभोग का उत्सव स्वीकार्य है।

परंतु जैसे ही आत्मसंयम, धर्म या जीवन-मूल्यों की बात आती है—उसे ‘उपदेश’ कहकर खारिज कर दिया जाता है।

यह समझना आवश्यक है कि:

📌 मोटिवेशन यदि आत्मा को दिशा न दे, तो वह केवल मनोरंजन बनकर रह जाता है।

📌 जैन सोशल ग्रुप जैसे मंच समाज निर्माण के लिए बने थे, न कि पाश्चात्य दिखावे और फूहड़ तालियों के लिए।

जहाँ मंच से धर्म की बात करने वाले को चुप कराने का प्रयास हो, वहां संगठन नहीं—भीड़ संचालित होती है। तीर्थ केवल पत्थरों की संरचना नहीं होते, वे चेतना के केंद्र होते हैं। यदि तीर्थ और धर्म की चर्चा भी असहज लगे, तो समस्या वक्ता की नहीं…. श्रोता की मानसिकता की है।

आज जो फूहड़ता और हल्कापन जैन मंचों पर दिखाई देता है, वह वर्षों से पनपी उस सोच का परिणाम है जिसने गंभीरता को “पुरानी” और आत्मचिंतन को “नेगेटिव” घोषित कर दिया।

✍️ निष्कर्ष:

यह लेख किसी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि जैन समाज की आत्मा को आईना दिखाने का प्रयास है।

यदि जैन सोशल ग्रुप:

❌ धर्म से कट गया,

❌ संस्कार से दूर हो गया,

❌ और केवल दिखावे का मंच बन गया…

…तो आने वाली पीढ़ी ‘जैन’ नाम तो जानेगी, पर ‘जैन विचार’ नहीं।

अब निर्णय समाज को लेना है:

हमें तालियों की भीड़ चाहिए या विचारशील समाज? 🤔

क्योंकि जिस दिन जैन मंचों से धर्म को बाहर कर दिया गया, उस दिन जैन समाज का पतन भीतर से शुरू हो जाएगा।

✒️ खबर पर नजर

(जैन समाज, चिंतन, और बदलाव की ओर एक पहल)

 

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Author: KPN News

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