कम सुनने की समस्या को न करें नजरअंदाज, बढ़ सकता है भूलने की बीमारी का खतरा

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कम सुनने की समस्या को न करें नजरअंदाज, बढ़ सकता है भूलने की बीमारी का खतरा
विशेष रिपोर्ट: खुशी श्रीमाल, खबर पर नजर परिवार
नई दिल्ली: चिकित्सा विशेषज्ञों और हालिया शोधों ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है कि सुनने की क्षमता में कमी केवल कानों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह सीधे तौर पर इंसान की याददाश्त को प्रभावित करती है। एम्स, नई दिल्ली के प्रोफेसर कपिल सिक्का के अनुसार, 60 वर्ष की आयु के बाद यदि कम सुनाई देने की समस्या का समय पर उपचार न किया जाए, तो यह ‘डिमेंशिया’ यानी भूलने की बीमारी का बड़ा कारण बन सकता है। www.hearingcareaid.in
शोध के अनुसार, जब कान कम सुनते हैं, तो मस्तिष्क का ‘ऑडिटरी कॉर्टेक्स’ हिस्सा धीरे-धीरे निष्क्रिय होने लगता है। दिमाग शब्दों के खाली स्थान को भरने में अपनी पूरी ऊर्जा खर्च कर देता है, जिससे नई यादें बनाने के लिए आवश्यक मानसिक शक्ति नहीं बचती। इसे ‘न्यूरल एट्रोफी’ कहा जाता है, जिसमें मस्तिष्क का वह हिस्सा सिकुड़ने लगता है जो सुनने का काम करता है।
विशेषज्ञों ने चार मुख्य संकेतों की पहचान की है: फोन पर आवाज कटी-कटी लगना, महिलाओं या बच्चों की बारीक आवाज समझने में कठिनाई, टीवी की आवाज बहुत तेज रखना और भीड़भाड़ वाली जगहों पर बातचीत न समझ पाना। यदि ऐसे लक्षण दिखें, तो तुरंत ‘ऑडियोमेट्री टेस्ट’ करवाना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर ‘हियरिंग एड’ यानी सुनने की मशीन का उपयोग शुरू करने से दिमाग के न्यूरल नेटवर्क सक्रिय रहते हैं और याददाश्त सुरक्षित रहती है।
पत्रकार: शैलेंद्र श्रीमाल
वेबसाइट: KPNindia.in

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Author: KPN News

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