नई दिल्ली, दिल्ली
भारत और रूस के बीच संबंधों में समुद्री संपर्क तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। दोनों देश अब नॉर्दर्न सी रूट यानी उत्तरी समुद्री मार्ग के जरिए कार्गो परिवहन को आगे बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। भारत की योजना इस आर्कटिक मार्ग से यूरोप की दिशा में अपना पहला कार्गो भेजने की है। रिपोर्टों के मुताबिक यह शिपमेंट 2027 में भेजे जाने की तैयारी है।
नॉर्दर्न सी रूट रूस के उत्तरी तट के साथ आर्कटिक महासागर से होकर गुजरता है। यह मार्ग एशिया और यूरोप के बीच समुद्री दूरी को कम करने की क्षमता रखता है। मौजूदा आकलनों के अनुसार कुछ परिस्थितियों में NSR पारंपरिक समुद्री मार्गों की तुलना में यात्रा समय को करीब 40 प्रतिशत तक कम कर सकता है। इससे माल ढुलाई की लागत और समय दोनों में बचत की संभावना है।
हालांकि इस खबर से जुड़े एक आंकड़े को लेकर सावधानी जरूरी है। 40 दिन से घटाकर 24 दिन का आंकड़ा नॉर्दर्न सी रूट का नहीं है। यह चेन्नई-व्लादिवोस्तोक ईस्टर्न मैरीटाइम कॉरिडोर से संबंधित है। भारत सरकार के अनुसार इस कॉरिडोर से भारत के पूर्वी तट और रूस के सुदूर पूर्वी बंदरगाहों के बीच कार्गो परिवहन में करीब 16 दिन की बचत हो सकती है।
NSR को लेकर भारत और रूस के बीच औपचारिक स्तर पर काम आगे बढ़ रहा है। दोनों देशों ने इस मार्ग पर सहयोग के लिए संयुक्त कार्य समूह बनाया है। इसकी पहली बैठक 10 अक्टूबर 2024 को नई दिल्ली में हुई थी। बैठक में भारतीय और रूसी अधिकारियों ने कार्गो ट्रांजिट के लक्ष्य, आर्कटिक क्षेत्र में संयुक्त जहाज निर्माण परियोजनाओं और भारतीय नाविकों के लिए ध्रुवीय नौवहन प्रशिक्षण पर चर्चा की थी।
भारत की दिलचस्पी केवल माल ढुलाई तक सीमित नहीं है। रूस के आर्कटिक क्षेत्र में बंदरगाहों के इस्तेमाल, जहाज निर्माण, कंटेनर बेड़े और अन्य समुद्री बुनियादी ढांचे में सहयोग की संभावनाओं पर भी चर्चा हो रही है।
भारत के लिए यह मार्ग रणनीतिक रूप से भी अहम हो सकता है। स्वेज नहर और लाल सागर जैसे पारंपरिक व्यापार मार्गों में व्यवधान की स्थिति ने दुनिया को वैकल्पिक समुद्री गलियारों की जरूरत का एहसास कराया है। ऐसे में NSR भारत के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकता है।
हालांकि आर्कटिक समुद्री मार्ग को नियमित व्यापारिक गलियारा बनाने में मौसम, बर्फ, विशेष जहाजों, बीमा, बंदरगाह सुविधाओं और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। इसलिए भारत के पहले कार्गो के बाद ही इस मार्ग की व्यावहारिक क्षमता का बेहतर आकलन किया जा सकेगा।










