ओडिशा का अनोखा गोटीपुआ नृत्य, 16वीं सदी से चली आ रही परंपरा में महिलाओं के वेश में नाचते हैं लड़के

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पुरी, ओडिशा

ओडिशा की नृत्य परंपरा का जिक्र होते ही सबसे पहले ओडिसी नृत्य का नाम सामने आता है। लेकिन ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान केवल ओडिसी तक सीमित नहीं है। राज्य की एक प्राचीन और अनोखी नृत्य परंपरा गोटीपुआ भी कला और संस्कृति की दुनिया में खास महत्व रखती है। इस नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कम उम्र के लड़के महिलाओं का वेश धारण कर प्रस्तुति देते हैं।

गोटीपुआ नृत्य की शुरुआत 16वीं शताब्दी के आसपास मानी जाती है। सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार, देवदासी या महारी परंपरा के कमजोर पड़ने के बाद नृत्य की इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए लड़कों ने महिला वेश में नृत्य करना शुरू किया। समय के साथ यह शैली विकसित हुई और ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।

माना जाता है कि गोटीपुआ परंपरा का ओडिसी नृत्य के विकास से भी संबंध रहा है। दोनों नृत्य शैलियों में भक्ति और शास्त्रीय तत्वों का प्रभाव दिखाई देता है। गोटीपुआ की प्रस्तुतियों में विशेष रूप से भगवान कृष्ण और राधा से जुड़े प्रसंगों को नृत्य, संगीत और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।

गोटीपुआ शब्द का क्या अर्थ है?

गोटीपुआ शब्द ओड़िया भाषा से बना है। इसमें ‘गोटी’ का अर्थ एक या अकेला और ‘पुआ’ का अर्थ लड़का होता है। कहा जाता है कि इस नृत्य की शुरुआती परंपरा में एक लड़का अकेले प्रस्तुति देता था, जिसके कारण इस कला को गोटीपुआ कहा जाने लगा।

हालांकि, समय के साथ इसकी प्रस्तुति शैली में बदलाव हुआ। अब गोटीपुआ नृत्य को समूह में भी प्रस्तुत किया जाता है और कई कलाकार एक साथ मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।

महिलाओं के वेश में करते हैं प्रस्तुति

गोटीपुआ नृत्य में आमतौर पर कम उम्र के लड़के हिस्सा लेते हैं। वे महिलाओं की तरह पारंपरिक परिधान पहनते हैं और विशेष श्रृंगार करते हैं। नृत्य के दौरान कलाकार भाव-भंगिमाओं, आंखों के भाव और शारीरिक मुद्राओं के माध्यम से अलग-अलग कथाओं को प्रस्तुत करते हैं।

इस नृत्य की एक खास पहचान कलाकारों की अद्भुत शारीरिक लचक भी है। वे कई कठिन मुद्राएं बनाते हैं और प्रस्तुति को आकर्षक बनाने के लिए शरीर के संतुलन और लचीलेपन का शानदार प्रदर्शन करते हैं।

आज भी ओडिशा के कई क्षेत्रों में गोटीपुआ नृत्य की परंपरा जीवित है। विभिन्न गुरुकुलों और सांस्कृतिक संस्थानों में बच्चों को इसका प्रशिक्षण दिया जाता है। सदियों पुरानी यह कला आज भी भक्ति, संस्कृति और लोक परंपरा के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंच रही है और ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बना रही है।

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Author: KPN News

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