नई दिल्ली, दिल्ली। यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर शुल्क को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। वित्त मामलों की संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष और भाजपा सांसद भर्तृहरि महताब ने समिति की रिपोर्ट का बचाव करते हुए कहा है कि रिपोर्ट तैयार करने, उस पर चर्चा करने और उसे अपनाने की पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड पर है। उन्होंने विपक्ष के उन दावों को भी खारिज किया है, जिनमें समिति की रिपोर्ट को लेकर असहमति जताई गई है।
महताब की यह प्रतिक्रिया कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी के उस सोशल मीडिया पोस्ट के बाद आई, जिसमें उन्होंने उन दावों को खारिज किया था कि विपक्षी सदस्यों ने डिजिटल पेमेंट पर एमडीआर लागू करने के प्रस्ताव का समर्थन किया था।
महताब ने कहा कि संसदीय समिति की रिपोर्ट तैयार करने और उसे अपनाने की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है। उनके अनुसार, इस मामले में भी समिति ने उसी प्रक्रिया का पालन किया और रिपोर्ट सर्वसम्मति से अपनाई गई।
क्या है पूरा विवाद?
विवाद का केंद्र मर्चेंट यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर शुल्क है। दिए गए विवरण के मुताबिक, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी एनपीसीआई ने 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क लगाने का फैसला किया है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होने की बात कही गई है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस शुल्क को वापस लेने की मांग की है। विपक्ष की ओर से डिजिटल भुगतान पर अतिरिक्त शुल्क को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
इसके जवाब में सरकार और भाजपा ने वित्त मामलों की संसदीय स्थायी समिति की अगस्त 2026 की रिपोर्ट का हवाला दिया है। इस रिपोर्ट में यूपीआई इकोसिस्टम को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए चरणबद्ध राजस्व मॉडल जल्द लागू करने की सिफारिश का उल्लेख है।
भाजपा ने विपक्ष की भूमिका पर उठाए सवाल
भाजपा का कहना है कि समिति की रिपोर्ट जब अपनाई गई, उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी और गौरव गोगोई समिति में मौजूद थे। भाजपा का दावा है कि इन सदस्यों ने रिपोर्ट के खिलाफ कोई लिखित असहमति दर्ज नहीं कराई थी।
इसी दावे को लेकर कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने आपत्ति जताई। उन्होंने एमडीआर लागू करने के प्रस्ताव का समर्थन किए जाने के दावे को खारिज किया। इसके बाद समिति के अध्यक्ष भर्तृहरि महताब ने रिपोर्ट की प्रक्रिया और रिकॉर्ड का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखा।
यूपीआई के भविष्य के मॉडल पर बहस
यूपीआई भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था का प्रमुख हिस्सा है। ऐसे में इसके आर्थिक मॉडल को लेकर होने वाली कोई भी नीति बहस सीधे बैंकों, भुगतान कंपनियों, कारोबारियों और उपभोक्ताओं से जुड़ती है।
एक तरफ सरकार और भाजपा संसदीय समिति की रिपोर्ट में सुझाए गए चरणबद्ध राजस्व मॉडल को आर्थिक स्थिरता के नजरिए से देख रहे हैं। दूसरी तरफ विपक्ष मौजूदा एमडीआर व्यवस्था का विरोध कर रहा है और इसे वापस लेने की मांग कर रहा है।
फिलहाल विवाद का एक अहम पहलू यह भी है कि संसदीय समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों को मौजूदा एमडीआर व्यवस्था से किस तरह जोड़ा जाए। भर्तृहरि महताब का कहना है कि समिति की पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड पर है और रिपोर्ट सर्वसम्मति से अपनाई गई थी। वहीं विपक्ष इस व्याख्या पर सवाल उठा रहा है।
इस तरह यूपीआई एमडीआर का मुद्दा अब सिर्फ शुल्क का मामला नहीं रहा, बल्कि यह संसदीय प्रक्रिया, डिजिटल भुगतान की आर्थिक स्थिरता और सरकार-विपक्ष के बीच नीति संबंधी मतभेद का बड़ा मुद्दा बन गया है।









