नई दिल्ली, भारत
सुप्रीम कोर्ट ने छह वर्षीय सौतेली बेटी के बार-बार यौन शोषण और उसकी हत्या के मामले में दोषी की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। अदालत ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि दोषी को अपनी बाकी प्राकृतिक जिंदगी जेल में बितानी होगी और उसे सामान्य छूट का लाभ नहीं मिलेगा।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने 157 पन्नों के फैसले में पीड़िता की मां की गवाही को भरोसेमंद माना। अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न की शिकार महिला का तुरंत शिकायत न कर पाना असामान्य व्यवहार नहीं है। केवल इस आधार पर उसकी गवाही पर संदेह नहीं किया जा सकता।
सत्र अदालत से हाई कोर्ट तक बरकरार रही थी मौत की सजा
मामले में सत्र अदालत ने छह वर्षीय बच्ची के बार-बार यौन शोषण और गला घोंटकर हत्या के लिए उसके सौतेले पिता को मौत की सजा सुनाई थी। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने नवंबर 2019 में इस सजा को बरकरार रखा था।
दोषी ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उसकी मुख्य दलील थी कि अपराध की एकमात्र चश्मदीद गवाह उसकी पत्नी थी और उसने घटना के बारे में लंबे समय तक पुलिस या अन्य अधिकारियों को जानकारी नहीं दी। दोषी के अनुसार, इस देरी के कारण उसकी गवाही पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।
‘शिकायत न करना गवाही को झूठा नहीं बनाता’
पीठ ने कहा कि घरेलू हिंसा और यौन शोषण का सामना करने वाली महिलाओं की चुप्पी को संदेह का आधार बनाना सही नहीं है। अदालत ने कहा कि हिंसा की परिस्थितियों में रहने वाली महिला सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक दबावों के कारण शिकायत करने में असमर्थ हो सकती है।
पीठ ने NFHS-5 के आंकड़ों का भी उल्लेख किया। 2019 से 2021 के बीच किए गए इस सर्वे के अनुसार, भारत में 18 से 49 वर्ष की लगभग 29.3 प्रतिशत विवाहित महिलाओं ने पति द्वारा शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करने की बात कही थी। इनमें लगभग तीन-चौथाई महिलाओं ने कभी किसी से मदद नहीं मांगी।
अदालत ने कहा कि इन आंकड़ों से यह समझने में मदद मिलती है कि हिंसा के बाद महिला का चुप रहना असामान्य नहीं है। पीठ ने यह भी कहा कि किसी पीड़ित या गवाह के व्यवहार को परखने के लिए कोई ऐसा निश्चित मॉडल नहीं है, जिस पर खरा न उतरने पर उसे झूठा मान लिया जाए।
महिला की परिस्थितियों पर भी अदालत की नजर
पीठ ने पीड़िता की मां की व्यक्तिगत परिस्थितियों का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, वह अपनी पहली शादी के बाद विधवा हो गई थी और उसके पास आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं था। इसके बाद उसने दूसरी शादी की और अपने बच्चे को भी नए घर में लेकर आई।
अदालत ने कहा कि ऐसे घरेलू वातावरण में रहने वाली महिला से यह उम्मीद करना वास्तविक नहीं है कि वह हर परिस्थिति में तुरंत पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत करेगी। उसकी मजबूर चुप्पी को अपराध में मिलीभगत मानना उचित नहीं होगा।
मृत्युदंड को उम्रकैद में बदला
सुप्रीम कोर्ट ने अपराध को बेहद गंभीर और असाधारण रूप से गंभीर परिस्थितियों वाला माना। हालांकि, पीठ ने कहा कि दोषी के पक्ष में कुछ वास्तविक परिस्थितियां भी मौजूद थीं और सरकार ने उसके सुधार की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया था।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने मृत्युदंड को उम्रकैद में बदल दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि दोषी को अपनी बाकी प्राकृतिक जिंदगी जेल में बितानी होगी।
अदालत ने यह भी कहा कि पीड़िता की मां का बयान भरोसेमंद था और उसे मेडिकल साक्ष्यों तथा फोन रिकॉर्ड से भी समर्थन मिला। फैसले में अदालत ने यह संदेश दिया कि यौन और घरेलू हिंसा के मामलों में पीड़िता या गवाह की शिकायत में देरी को उसके बयान की विश्वसनीयता के खिलाफ स्वतः इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।









