शंघाई, चीन
वर्ल्ड स्किल्स प्रतियोगिता 2026 के आयोजन के दौरान चीन का कौशल विकास मॉडल भारतीय अधिकारियों के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय बन गया है। शंघाई में आयोजित प्रतियोगिता में हिस्सा लेने पहुंचे भारतीय दल के अधिकारियों ने जुहुई डिस्ट्रिक्ट स्थित शंघाई इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी स्कूल का दौरा कर वहां प्राथमिक स्तर से व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था को समझा।
चीन लगातार चार बार वर्ल्ड स्किल्स प्रतियोगिता की पदक तालिका में शीर्ष पर रहा है। उसके इस प्रदर्शन के पीछे मजबूत कौशल इकोसिस्टम को प्रमुख कारणों में गिना जाता है। चीन में बच्चों को कम उम्र से ही व्यावहारिक गतिविधियों और तकनीकी कौशल से परिचित कराने की व्यवस्था विकसित की गई है।
स्कूल में छोटे बच्चों के लिए अलग-अलग कौशल गतिविधियों की प्रयोगशालाएं हैं। शुरुआती स्तर पर उन्हें घड़ी की असेंबलिंग, खिलौने बनाने और अन्य व्यावहारिक गतिविधियों से जोड़ा जाता है। इससे बच्चों में हाथ से काम करने, चीजों को समझने और तकनीकी गतिविधियों के प्रति रुचि विकसित करने पर जोर दिया जाता है।
चीन के मॉडल की एक खास बात यह भी है कि वोकेशनल शिक्षा को अकादमिक शिक्षा से अलग और कमतर विकल्प के रूप में नहीं देखा जाता। अधिकारियों के मुताबिक, इन स्कूलों में भाषा और अन्य आवश्यक अकादमिक ज्ञान के साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
63 कौशल विधाओं में भारत की भागीदारी
शंघाई में शुरू हुई वर्ल्ड स्किल्स प्रतियोगिता में 40 से अधिक देशों के प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। भारत ने कुल 64 में से 63 कौशल विधाओं में 70 प्रतिभागियों के दल के साथ भाग लिया है। प्रतियोगिता के परिणाम 27 सितंबर को घोषित किए जाएंगे।
भारत ने वर्ष 2014 में अलग कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय बनने के बाद इस क्षेत्र में संस्थागत प्रयासों को तेज किया है। इसके बावजूद कौशल शिक्षा को लेकर सामाजिक सोच बदलना अभी भी बड़ी चुनौती है।
प्रशिक्षण महानिदेशालय के महानिदेशक दिलीप कुमार ने चीन के स्कूल का दौरा करने के बाद इस बात पर जोर दिया कि कौशल को केवल अकादमिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए जरूरी मानने की सोच बदलनी होगी।
भारत में उद्योगों की जरूरत के अनुसार आधुनिक लैब, बेहतर प्रशिक्षण और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की जरूरत है। पीएम सेतु योजना के तहत औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों के कायाकल्प से इस दिशा में नई उम्मीद जगी है।









