मुंबई, महाराष्ट्र
टाटा संस में एन चंद्रशेखरन की तीसरी बार चेयरमैन के रूप में नियुक्ति को लेकर टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच विवाद गहराता जा रहा है। टाटा संस ने नोएल टाटा की ओर से उठाई गई आपत्ति को खारिज करते हुए अपने फैसले के समर्थन में तीन कानूनी राय पेश की हैं। कंपनी का कहना है कि 17 सितंबर 2026 को बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन का कार्यकाल बढ़ाने के लिए लिया गया फैसला Articles of Association यानी कंपनी के आंतरिक नियमों के अनुरूप है।
टाटा संस की ओर से यह कदम टाटा ट्रस्ट्स की तरफ से बोर्ड बैठक में उठाए गए सवालों के जवाब में उठाया गया है। इस पूरे मामले में बोर्ड की निर्णय प्रक्रिया और चेयरमैन के कास्टिंग वोट की भूमिका मुख्य मुद्दा बन गई है।
Article 121 को लेकर क्या है विवाद?
टाटा संस के Articles of Association में Article 121 बोर्ड के फैसलों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान है। इसके तहत कुछ फैसलों के लिए निदेशकों के बहुमत की आवश्यकता होती है। साथ ही, इसमें बराबर वोट होने की स्थिति में चेयरमैन को कास्टिंग वोट देने का अधिकार भी दिया गया है।
चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के मामले में इसी कास्टिंग वोट और बोर्ड की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। टाटा संस ने कानूनी राय के आधार पर कहा है कि 17 सितंबर को बोर्ड द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया कंपनी के नियमों के अनुरूप थी।
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जजों की कानूनी राय
इस विवाद में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस बी. एन. श्रीकृष्ण और जस्टिस उदय यू. ललित की राय महत्वपूर्ण है। दोनों पूर्व न्यायाधीशों ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति से जुड़े बोर्ड के फैसले और चेयरमैन के कास्टिंग वोट को नियमों के अनुरूप माना है।
टाटा संस के लिए यह कानूनी राय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे कंपनी को बोर्ड के फैसले का बचाव करने के लिए एक मजबूत कानूनी आधार मिलता है।
टाटा ट्रस्ट्स की आपत्ति अभी कायम
हालांकि टाटा संस ने नोएल टाटा की आपत्ति को कानूनी आधार पर खारिज कर दिया है, लेकिन टाटा ट्रस्ट्स अपनी आपत्ति पर कायम है। ऐसे में विवाद फिलहाल पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच संबंध टाटा समूह के कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसलिए चेयरमैन की नियुक्ति जैसे मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद समूह के प्रशासनिक ढांचे के लिए भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
अब क्या हो सकता है?
आगे का रास्ता मुख्य रूप से दोनों पक्षों के रुख पर निर्भर करेगा। टाटा ट्रस्ट्स कानूनी रायों के बाद अपने रुख की समीक्षा कर सकता है या अपनी आपत्ति को आगे भी कायम रख सकता है। यदि दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बनती है, तो विवाद आगे औपचारिक कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
फिलहाल टाटा संस का कहना है कि 17 सितंबर का बोर्ड फैसला कंपनी के Articles of Association के अनुरूप है और उसे प्राप्त कानूनी राय भी इस रुख का समर्थन करती हैं।
चंद्रशेखरन की तीसरी पारी पर उठे सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह मामला केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में टाटा संस के बोर्ड की निर्णय प्रक्रिया, ट्रस्ट्स की भूमिका और कंपनी के आंतरिक नियमों की व्याख्या जैसे व्यापक कॉरपोरेट गवर्नेंस के मुद्दे हैं।
आने वाले दिनों में टाटा ट्रस्ट्स के अगले कदम पर सभी की नजर रहेगी। यदि विवाद बातचीत से नहीं सुलझता, तो आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि चंद्रशेखरन की तीसरी पारी को लेकर उठे सवाल किस तरह समाप्त होते हैं।









