अमेरिका में 3 नवंबर को मिडटर्म चुनाव होने वाले हैं, जिनका असर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी पर भी पड़ेगा। इन चुनावों में ट्रंप की पार्टी के सामने अपनी पकड़ बनाए रखने की बड़ी चुनौती होगी। इतिहास बताता है कि पिछले 76 वर्षों में राष्ट्रपति की पार्टी को मिडटर्म चुनावों में लगातार नुकसान उठाना पड़ा है।
मिडटर्म चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी का चुनौतीपूर्ण दौर
मिडटर्म चुनाव हर दो साल में होते हैं, जिनमें प्रतिनिधि सभा की 435 सीटों और सीनेट की 100 में से कुछ सीटों पर चुनाव होता है। ये चुनाव राष्ट्रपति के कामकाज के प्रति जनता की राय का आइना होते हैं, हालांकि राष्ट्रपति का नाम वोटिंग बेलट पर नहीं होता। 1946 से 2022 तक कुल 20 मिडटर्म चुनावों में 18 बार राष्ट्रपति की पार्टी ने हाउस में अपने कई सीटों का नुकसान किया है।
अमेरिकी राजनीति में राष्ट्रपति की पार्टी को मिडटर्म चुनावों में वोटरों की नाराजगी का सामना करना पड़ता है, जिसे ‘प्रेसिडेंशियल पेनल्टी’ कहा जाता है। इसमें महंगाई, रोजगार और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दे वोटिंग पर प्रभाव डालते हैं। इसलिए अक्सर विपक्षी पार्टी को अधिक सीटें मिलती हैं, जिससे सत्ता का संतुलन बदल जाता है।
राष्ट्रपतियों के कार्यकाल में हाउस सीटों का नुकसान
इतिहास में केवल दो बार ही राष्ट्रपति की पार्टी को मिडटर्म चुनावों में फायदा हुआ था: 1998 में बिल क्लिंटन की डेमोक्रेटिक पार्टी को और 2002 में जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की रिपब्लिकन पार्टी को कुछ सीटें मिली थीं। अन्य सभी 18 चुनावों में पार्टी को नुकसान हुआ है। डेमोक्रेटिक पार्टियों को औसतन 29 सीटें गंवानी पड़ीं, जबकि रिपब्लिकन औसतन 23 सीटों से वंचित रहे।
सबसे बड़ा नुकसान 2010 में बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान हुआ, जब डेमोक्रेटिक पार्टी ने 64 सीटें हारीं और हाउस का नियंत्रण रिपब्लिकन पार्टी को मिल गया। वहीं, रिपब्लिकन की सबसे बड़ी हार 1958 में आइजनहावर के समय हुई थी, जब उन्हें 50 सीटें गंवानी पड़ीं। डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी ने भी 2018 में 42 सीटें हारीं।
सीनेट की सीटों की बात करें तो राष्ट्रपति की पार्टी ने 20 मिडटर्म चुनावों में 13 बार नुकसान उठाया है। सीनेट में हर बार केवल लगभग एक-तिहाई सीटें ही चुनाव में आती हैं। 1958 में आइजनहावर के कार्यकाल में रिपब्लिकन पार्टी को 13 सीटें गंवानी पड़ीं। 2014 में ओबामा की पार्टी को नौ सीटें गंवानी पड़ीं और सीनेट का नियंत्रण भी खो दिया।
सीनेट के चुनाव के परिणाम कई बार राज्यीय राजनीतिक स्थिति पर भी निर्भर करते हैं। 1966 में लिंडन जॉनसन की पार्टी ने सीटें गंवाईं, लेकिन बहुमत बचाए रखा। इसके विपरीत, 1986 में रीगन की पार्टी ने सीनेट खो दिया। यह चुनाव परिणाम राष्ट्रपति की नीतियों को लागू करने की क्षमता पर असर डालते हैं।
राष्ट्रपति पर होता है क्या प्रभाव?
अगर विपक्ष की पार्टी कांग्रेस के किसी भी सदन में बहुमत हासिल करती है, तो वह राष्ट्रपति के एजेंडे में बाधा बन सकती है। इसके अलावा विपक्ष महाभियोग की जांच शुरू कर सकता है और नियुक्तियों पर सीनेट से रोक लगा सकता है। इस बार डेमोक्रेटिक पार्टी को हाउस में बहुमत के लिए तीन और सीनेट में चार अतिरिक्त सीटें चाहिए।
इसलिए 3 नवंबर के चुनाव परिणाम यह तय करेंगे कि राष्ट्रपति ट्रंप अपनी नीतियां कैसे आगे बढ़ा पाते हैं। पिछले चुनावों के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति की पार्टी के लिए मुश्किल भरे होते हैं, और ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को इसका सामना फिर से करना पड़ सकता है।








